सबसे बूरा होता है संवेदनाअों का मर जाना”(मोहम्मद फैज़ान, इंसाफ टाईंम्स)

आज पूरा देश कोविड 2.0(covid-19) की चपेट में है , हर तरफ चीख-पुकार मची हुई है, कहीं ऑक्सीजन नहीं है तो कहीं अस्पताल में में बेड नहीं है, कहीं डाक्टरों की कमी है तो कहीं इंजेक्शन नहीं हैl हर तरफ एक ही तरह की अफरातफरी है, वहीं सोशल मीडिया पर अा रहीं तस्वीरें स्थिती की भयावहता को साफ प्रदर्शित कर रही हैं, कहीं लोग ज़मीन पर लेटे हुए हैं तो कहीं लोग एंबुलेंश के इंतज़ार में दम तोड़ रहे हैं तो कहीं शवों को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान में घंटों इंतज़ार करना पड़ रहा है, पिछले तीन दिनों से पूरे देश में 2 लाख से अधिक मामले आ रहें हैं, वहीं प्रत्येक दिन 1600 से अधिक लोग अपनी जान गवां रहे हैं, ये सब सरकारी आंकड़े हैं, जिस प्रकार से श्मशान घाटों से तस्वीरें आ रही हैं उसके हिसाब से ये आंकड़ें कम दिख रहे हैंl अब सवाल ये है कि आखिर देश में ये स्थिती क्यों उत्पन्न हुई? आखिर कहाँ चुक हो गई कि आज भारत इसके गहरे की चपेट में अा गया? इन सब सवालों के जवाब लिए जायेंगे और वक्त आने पर ज़रूर लिए जायेंगे लेकिन इस समय जबकि पूरा देश इस गंभीर समस्या से ग्रसित है बंगाल में विधानसभा चुनाव की रैलियाँ ज़ोरों पर हैं, कोरोना के नियमों और दिशा-निर्देशों को बाला-ए-ताक रखकर सभी नेता चुनावी सभाअों में व्यस्त हैं, खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लगातार चुनावी सभा और रोडशो कर रहे हैं क्या ये संवेदनहीनता नहीं है? हरिद्वार में कुम्भ स्नान में भारी भीड़ जुटी हुई है लेकिन उसे मौन समर्थन देकर जारी रखा जाता है क्या ये संवेदनहीनता नहीं है? आज से लगभग 20-25 दिन पहले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में कोरोना के दूसरे लहर की शुरूआत हुई थी लेकिन उस के बाद भारत के दूसरे ईलाकों में ज़रूरी इंतजाम क्यों नहीं किए गए, क्या ये संवेदनहीनता नहीं है? पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक पत्र लिखकर सरकार को कुछ सुझाव दिए लेकिन इसके जवाब में केन्द्रीय स्वस्थ मंत्री हर्षवर्धन नें ऊँहें पत्र लिखकर इस मामलें में राजनीति करने का आरोप मढ दिया, जब देश इस समय गंभीर संकट से गुज़र रहा है ऐसे समय में आरोप प्रत्यारोप करना क्या संवेदनहीनता नहीं है? अगर कोई सरकार को सुझाव देता है तो इस स्थिती में सरकार को उसपर विनम्रता से विचार करना चाहिए था लेकिन मंत्री जी उल्टे ही सुझाव देने वाले को ही नसीहत देने लगे, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट करके बताया कि उनके पास 8-10 घंटे ही ऑक्सीजन उपलब्ध हो पा रहा है, लोग लगातार ट्वीट करके नेताअों और पत्रकारों को टैग कर मदद की गुहार लगा रहे हैं, किसी को ऑक्सीजन नहीं मिल रहा तो किसी को अस्पताल में बेड, जबकि देश में ये स्थिती यकायक उत्पन्न नहीं हुई है बल्कि पिछले 20-25 दिनों से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में लगातार मामलें बढ रहे थे लेकिन सरकार अलर्ट नहीं थी और अगर थी तो ये हालात क्यों है, क्या ये संवेदनहीनता नही है? जी हाँ ये सब संवेदनहीनता ही है, इनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं, इन लोगों को आपसे कोई प्यार नहीं है इन्हें बस सत्ता से प्यार है, अगर आपको अपने और अपने परीवार से प्यार है तो आप खुद ही कोरोना से बचने वाले तमाम दिशा-निर्देशों का पालन करें, अगर किसी को कोरोना हो गया हो तो उसकी मदद करें(स्थिती बहुत भयावह है)l इन तथाकथित लोगों पर अब कोई भरोसा नहीं है क्यूंकी इनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं, पाश ने कहा था “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना” मैं कहता हूँ “सबसे बूरा होता है संवेदनाअों का मर जाना” क्यूंकी जब लोग संवेदनहीन हो जाते हैं तब ऊँहे आपसे कोई फर्क नहीं पड़ता, आपकी जान जाने से भी नहीं, बस आप अपनी संवेदनाएं ना मरने दें|

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