इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
ओडिशा के रायगढ़ा जिले के काशीपुर ब्लॉक स्थित बैगानगुडा गांव से जातीय कट्टरता और सामाजिक बर्बरता की एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। एक आदिवासी परिवार को सिर्फ इसलिए सामाजिक बहिष्कार और ‘शुद्धिकरण’ की अमानवीय रस्म का सामना करना पड़ा क्योंकि उनकी बेटी ने अपनी मर्ज़ी से एक दलित युवक से शादी कर ली।
जाति के नाम पर ‘सजा’: जानवर की बलि और सामूहिक मुंडन
गाँव की तथाकथित पंचायत ने इस अंतर-जातीय विवाह को “गाँव की मान-मर्यादा” के ख़िलाफ़ बताते हुए पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया। उन्हें समाज में वापस आने के लिए एक ‘शुद्धिकरण अनुष्ठान’ करने का फरमान सुनाया गया—जिसमें पहले जानवर की बलि दी गई और फिर परिवार के 40 सदस्यों का सामूहिक सिर मुंडवाया गया।
इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसमें खेत में बैठे लोगों के सिर मुंडे हुए साफ़ देखे जा सकते हैं।
वीडियो वायरल होने के बाद काशीपुर ब्लॉक के बीडीओ विजय सोय ने तत्काल जांच के आदेश दिए और गांव में अधिकारियों की टीम भेजी गई है। उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई महज़ दिखावटी बनकर रह जाएगी या सच में ऐसे सामाजिक अन्याय को रोकने की दिशा में कोई ठोस पहल होगी?
यह घटना कोई अपवाद नहीं है। ओडिशा में अंतर-जातीय विवाह के कारण पहले भी कई अमानवीय घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बरगढ़ जिले में एक व्यक्ति को उसकी मौत के बाद अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं मिला था क्योंकि उसने दूसरी जाति में शादी की थी। वहीं 2019 में मयूरभंज जिले में एक अंतर-जातीय प्रेमी युगल को गाँव वालों ने सिर मुंडवाकर सड़कों पर घुमाया था।
गौरतलब है कि ओडिशा सरकार अंतर-जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन राशि देती है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि जातिवाद की जड़ें अब भी ग्रामीण समाज में इतनी गहरी हैं कि कानून और योजनाएं अक्सर बौनी साबित होती हैं।
यह मामला केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो आज़ादी के 75 साल बाद भी जाति के आधार पर लोगों की ज़िंदगियाँ तय करती है। अब वक्त आ गया है कि ऐसे मामलों पर केवल प्रशासनिक जांच न हो, बल्कि सरकार और समाज मिलकर इस मानसिकता के खिलाफ खुला मोर्चा खोलें।
