‘माओवाद समाप्ति’ के नाम पर आदिवासी इलाकों में बढ़ता सैन्य दमन: 41 संगठनों और 88 नागरिकों का संयुक्त बयान, सरकार से शांति की पहल की मांग

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

झारखंड, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य आदिवासी बहुल इलाकों में केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे सैन्य अभियानों पर गंभीर सवाल उठाते हुए शनिवार को 41 संगठनों और 88 नागरिकों ने एक साझा बयान जारी किया। यह बयान फादर स्टेन स्वामी की पुण्यतिथि (5 जुलाई) के अवसर पर जारी किया गया, जिन्हें आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष के कारण यूएपीए के तहत जेल में रखा गया था और जिनका 2021 में न्यायिक हिरासत में निधन हो गया था।

संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि माओवादी हिंसा की आड़ में सरकारें लगातार शांतिपूर्ण आदिवासी आंदोलनों, ग्राम सभाओं और स्थानीय संगठनों को निशाना बना रही हैं। वक्ताओं ने इसे जल, जंगल, ज़मीन और संविधान पर हमला करार दिया है।

बयान में जनवरी 2024 से बस्तर में चल रहे ऑपरेशन कगार का ज़िक्र करते हुए दावा किया गया है कि इस अभियान में अब तक लगभग 500 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में निर्दोष आदिवासी नागरिक शामिल हैं। आरोप है कि सुरक्षाबलों को इन अभियानों के लिए “इनाम” दिए जा रहे हैं, जिससे यह संदेह गहराता है कि कई हत्याएं सुनियोजित हैं।

संगठनों ने यह भी बताया कि बस्तर में 160 से अधिक और झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले में 25 सैन्य कैंप बिना ग्राम सभा की सहमति के बनाए गए हैं। इससे ग्रामीणों में भय का माहौल बना है और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर खतरे पैदा हुए हैं।

बयान में बताया गया कि बस्तर में सक्रिय मूलवासी बचाओ मंच जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया है और उनके नेताओं को यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया है, जबकि वे केवल खनन और विस्थापन के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन चला रहे थे।

वक्ताओं ने हाल ही में कर्रेगुट्टा क्षेत्र में हुए सैन्य अभियान का हवाला देते हुए कहा कि इस अभियान में मारे गए 31 लोगों में से अधिकांश निहत्थे नागरिक थे। आरोप है कि जवानों ने लाशों के पास बंदूकें लहराकर जश्न मनाया और शवों को कई दिनों तक छिपाकर रखा गया।

वहीं, मई 2025 में भाकपा (माओवादी) महासचिव बसवराजु की कथित मुठभेड़ में मौत के मामले में भी परिजनों को शव न दिखाया गया, न सौंपा गया। पुलिस द्वारा गुप्त अंतिम संस्कार किए जाने से गुप्त हत्या की आशंका को बल मिला है।

साझा बयान में केंद्र और राज्य सरकारों से निम्नलिखित मांगें की गई हैं

1.सभी सैन्य अभियानों पर तुरंत रोक लगाई जाए।
2.माओवादियों से वार्ता की प्रक्रिया शुरू की जाए।
3.मूलवासी बचाओ मंच पर लगा प्रतिबंध हटाया जाए और गिरफ्तार नेताओं को रिहा किया जाए।
4.ग्राम सभा की सहमति के बिना बनाए गए सैन्य कैंप हटाए जाएं।
5.संविधान की पांचवी अनुसूची, पेसा क़ानून और वन अधिकार क़ानून को पूरी तरह लागू किया जाए।

बयान में भाकपा (माओवादी) से भी आग्रह किया गया कि वह बीते दशकों के अनुभवों के आधार पर अपनी रणनीति की समीक्षा करे और न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप संघर्ष को ढाले, ताकि आदिवासी जनता के हितों की रक्षा संभव हो सके।

संयुक्त बयान में कहा गया कि “आदिवासी बहुल इलाकों को एक खुली जेल में तब्दील किया जा रहा है, जहां लोकतंत्र, कानून और न्याय केवल दिखावे के लिए हैं। सरकारों का असली उद्देश्य कॉरपोरेट कंपनियों के लिए संसाधनों की लूट का रास्ता साफ़ करना है। जब कोई इसका विरोध करता है, उसे माओवादी करार देकर कुचल दिया जाता है।”

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