शरजील इमाम: इंजीनियर से एक्टिविस्ट, अब जेल से लड़ेंगे बिहार चुनाव

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

क्या आपने कभी ऐसे नौजवान की कहानी सुनी है, जिसने आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग और एम.टेक किया हो, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस व डेटा साइंस में माहिर हो, लाखों के पैकेज वाली नौकरी छोड़कर समाज और राजनीति की राह चुन ली हो? यह कहानी है शरजील इमाम की—एक विद्वान स्कॉलर, निडर एक्टिविस्ट और अब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राजनीति के नए चेहरे के रूप में उभरते उम्मीदवार की।

बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

शरजील का जन्म बिहार के जहानाबाद ज़िले के कको गाँव में हुआ। उनके पिता अकबर इमाम समाजसेवी और राजनेता रहे, जिन्होंने 2000 और 2005 में विधानसभा चुनाव लड़ा, हालांकि जीत नहीं पाए। उनकी मां अफ़शान रहीम शिक्षित और धार्मिक महिला हैं, जिन्होंने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी। घर का माहौल सामाजिक और सियासी बहस से भरा रहता था, जिसने शरजील को कम उम्र से ही जागरूक बना दिया।

IIT से कॉर्पोरेट तक का सफर

शरजील पढ़ाई में शुरू से ही तेज़ थे। 2006 में IIT-JEE पास कर उन्होंने आईआईटी बॉम्बे में दाख़िला लिया और बी.टेक व एम.टेक पूरा किया। इसके बाद विदेशों और भारत की नामी कंपनियों में काम किया, लाखों का पैकेज मिला, लेकिन सवाल हमेशा बना रहा—“क्या ज़िंदगी सिर्फ नौकरी और बैंक बैलेंस तक सीमित है?” यही सवाल उन्हें कॉर्पोरेट की दुनिया छोड़कर रिसर्च और एक्टिविज़्म की ओर ले गया।

जेएनयू और एक्टिविज़्म

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) से मॉडर्न हिस्ट्री में एम.ए. किया और पीएचडी शुरू की। यहाँ रहकर उन्होंने भारतीय राजनीति, संविधान और मुस्लिम समाज की स्थिति पर कई लेख लिखे। उनके रिसर्च पेपर “The Hindu Republic” और “Over-Representation of Muslims in Indian Jails” जैसे लेखों ने बहस छेड़ी। शरजील का मानना था कि भारत का मौजूदा चुनावी सिस्टम अल्पसंख्यकों और वंचित तबकों को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व नहीं देता।

शाहीन बाग़ आंदोलन और विवाद

2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और NRC के खिलाफ़ देशभर में आंदोलन शुरू हुए। दिल्ली का शाहीन बाग़ प्रदर्शन इसी सिलसिले में ऐतिहासिक बन गया, जिसकी बुनियाद शरजील इमाम ने रखी। महिलाओं, बुज़ुर्गों और छात्रों की बड़ी संख्या ने इस आंदोलन को मज़बूत किया।
इसी बीच अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में दिए गए उनके 40 मिनट के भाषण को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया पर फैलाया गया। आरोप लगे कि वे देश तोड़ने की बात कर रहे हैं। इसके आधार पर उन पर दिल्ली, यूपी, असम, अरुणाचल और मणिपुर में कई मुकदमे दर्ज हुए।

गिरफ्तारी और मुकदमे

जनवरी 2020 में दिल्ली पुलिस ने शरजील को जहानाबाद से गिरफ्तार किया। उन पर राजद्रोह, हिंसा भड़काने और दंगों की साजिश रचने जैसे आरोप लगाए गए। हालांकि दिल्ली की साकेत कोर्ट ने एक मामले में उन्हें आरोपमुक्त करते हुए कहा कि पुलिस असली दोषियों को पकड़ने में विफल रही और शरजील जैसे छात्रों को बलि का बकरा बनाया गया। बावजूद इसके, वे पिछले पाँच साल से जेल में बंद हैं और अलग-अलग मामलों में मुकदमे झेल रहे हैं।

जेल से लिखे खत और विचार

जेल के भीतर से शरजील लगातार लेख और खत लिखते रहे हैं। उन्होंने proportional representation यानी आनुपातिक प्रतिनिधित्व की ज़रूरत, अल्पसंख्यकों की राजनीति और संविधान की कमियों पर गंभीर सवाल उठाए। एक खत में उन्होंने लिखा—“फासीवादी हुकूमत हम जैसे लोगों को कुचलना चाहती है, लेकिन असली ताक़त करोड़ों की तादाद वाली अवाम है।”

राजनीति में नई पारी

अब शरजील इमाम बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में किशनगंज की बहादुरगंज सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने जा रहे हैं। यह मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका है, जहाँ उनकी उम्मीदवारी ने पहले ही राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। सवाल यह है कि जिस कौम की खातिर वे पाँच साल से जेल में हैं, वही कौम उन्हें नायक बनाएगी या उनके विरोधी उन्हें खलनायक साबित करने में सफल होंगे?

शरजील इमाम की कहानी IIT बॉम्बे से लेकर शाहीन बाग़ तक, और अब जेल से चुनावी मैदान तक का सफर है। यह कहानी सिर्फ़ एक शख्स की नहीं, बल्कि भारत में अल्पसंख्यकों, लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व की लड़ाई की गवाही देती है। अब निगाहें बहादुरगंज की जनता पर टिकी हैं—क्या वे शरजील के विचारों और संघर्ष को नई राजनीतिक दिशा देंगे?

(ये स्टोरी इंसाफ़ टाइम्स दिल्ली के ब्यूरो चीफ़ शोएब मलिक आज़ाद ने तैयार किया है)

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