बिहार की सत्ता की असली कुंजी: अतिपिछड़ा समाज अब राजनीति का बड़ा खिलाड़ी

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

बिहार की राजनीति को समझना हो तो जाति की नजर से देखना जरूरी है। इस नजरिए से सबसे अहम और अब तक अनदेखा वर्ग है अतिपिछड़ा समाज (EBC)। कुल आबादी का लगभग 38% हिस्सा रखने वाले इस वर्ग में नाई, धोबी, तेली, कहार, मछुआरा, कुशवाहा-शाक्य-मौर्य, हलवाई, नोनिया, लोहार, माली, गोला, कुम्हार और दर्जनों अन्य छोटी जातियाँ शामिल हैं।

पहले ये समाज गाँवों में सेवा-आधारित जातियों के रूप में पहचाना जाता था—बाल काटना, कपड़ा धोना, मछली पकड़ना, रस्सी बनाना। शिक्षा और सामाजिक सम्मान की सीढ़ी पर ये सबसे नीचे रहे। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार में इनकी साक्षरता दर दलितों के बाद सबसे कम है, और उच्च शिक्षा तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में इनकी भागीदारी नगण्य है।

इतिहास में EBC समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी कम रहा। 1990 में मंडल राजनीति ने यादव-कुर्मी-कोइरी को ताक़त दी, लेकिन EBC वहीं पिछड़े ही रह गए।

2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद EBC को बिहार की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ बनाया गया। 2006 में पंचायत आरक्षण में 20% सीटें अतिपिछड़ों के लिए आरक्षित की गईं और महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू हुआ। इसने गाँव-गाँव में नाई, मछुआरा, धोबी, कहार जैसी जातियों की महिलाओं को मुखिया और सरपंच बनने का मौका दिया।

बीजेपी और कांग्रेस की नई रणनीति

2014 के बाद बीजेपी ने EBC वोट बैंक को साधने के लिए

तेली जाति (नरेंद्र मोदी स्वयं तेली जाति से हैं) से जुड़ाव,

कुशवाहा (मौर्य-शाक्य) वोट बैंक पर फोकस,

छोटे व्यापारिक जातियों को अपने पाले में लाने की कोशिश की।

वहीं तेजस्वी यादव और कांग्रेस भी अब EBC समाज को जोड़ने की कोशिश में हैं। कांग्रेस ने “अतिपिछड़ा न्याय यात्रा” के तहत गांव-गांव में कर्पूरी चौपाल और फिल्म स्क्रीनिंग के माध्यम से EBC को वैचारिक रूप से भी जोड़ने का प्रयास किया है।

2020 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में EBC समाज ने निर्णायक भूमिका निभाई। पंचायत और नगर निकाय चुनावों में भी इनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है। हालांकि, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष नेतृत्व अभी भी यादव, सवर्ण और कुर्मी जातियों के हाथ में है।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह समाज शिक्षा, आर्थिक और राजनीतिक एकता की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो बिहार का अगला बड़ा मुख्यमंत्री या राष्ट्रीय नेता इसी वर्ग से निकल सकता है।

बिहार की राजनीति की असली कुंजी अब अतिपिछड़े समाज के हाथ में है। कोई भी पार्टी इस वर्ग को नज़रअंदाज़ कर नहीं सकती।

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