इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
वर्ष 2025 का दशहरा इस बार खास होने जा रहा है। 2 अक्टूबर को पूरे देश में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और संयोग से इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती भी है। एक ओर दशहरा असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है, वहीं गांधीजी का जीवन सत्य और अहिंसा की मिसाल रहा है। ऐसे में इस बार का त्यौहार दोहरी प्रेरणा लेकर आया है।
देशभर में दशहरा के अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले दहन किए जाएंगे। शाम के समय मैदानों में जुटी भीड़ आतिशबाजी और “जय सिया राम” के नारों के बीच बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाएगी। रामलीला के मंचन का अंतिम दृश्य—रावण वध—भी इसी दिन संपन्न होगा। वहीं कई लोग अपने औजार और हथियार की पूजा कर नए कार्यों की सफलता की कामना करेंगे।
नवरात्रि के समापन पर देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर वध की स्मृति में इस दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है। दक्षिण भारत के मैसूर में शाही जुलूस और भव्य शोभायात्रा दशहरे का विशेष आकर्षण रहेगा।
त्यौहार की परंपरा के अनुसार लोग नए कपड़े पहनेंगे, पकवान बनाएंगे और रिश्तेदारों व दोस्तों से मिलकर शुभकामनाएँ देंगे। यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और सामूहिक एकता का अवसर भी है।
हालाँकि बदलते समय में दशहरे का असली संदेश कहीं खोता जा रहा है। लोग पुतले दहन कर तो संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन भीतर के लालच, क्रोध और अहंकार जैसे दोषों को मिटाना ही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य है।
इस बार का दशहरा हमें दोहरी सीख देता है—राम के आदर्शों को जीवन में उतारने की और गांधीजी की तरह सत्य-अहिंसा व समानता की राह पर चलने की। यही इस पर्व की सच्ची विजय है।