इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के जैदपुर थाना क्षेत्र स्थित मऊथरी गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहां भीम आर्मी के स्थानीय पदाधिकारी अशोक कुमार (45) ने कथित पुलिस उत्पीड़न और रिश्वतखोरी से तंग आकर आत्महत्या कर ली। उनका शव 1 अक्टूबर 2025 की सुबह गांव के बाहर एक पेड़ से लटका मिला।
अशोक कुमार, जो भीम आर्मी में तहसील न्याय पंचायत अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे, मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। परिजनों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, उन्हें जैदपुर थाना के थानाध्यक्ष संतोष और दरोगा निर्मल सिंह द्वारा एक झूठे मामले में फंसाने की धमकी दी जा रही थी। आरोप है कि इन पुलिसकर्मियों ने उनसे ₹75,000 की रिश्वत की मांग की थी। पैसे न देने पर उन्हें नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट जैसे गंभीर कानून के तहत फंसाने की धमकी दी गई।
अशोक कुमार आर्थिक रूप से कमजोर थे और यह रकम चुकाने में असमर्थ थे। उन्होंने अपनी जमीन बेचने की भी कोशिश की, लेकिन कोई तत्काल खरीदार नहीं मिला। लगातार हो रहे उत्पीड़न और मानसिक तनाव के कारण उन्होंने 1 अक्टूबर की रात फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
अशोक कुमार ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा और कई लोगों को व्हाट्सएप पर संदेश भी भेजे, जिसमें उन्होंने अपनी मौत के लिए जैदपुर थाने के संतोष इंस्पेक्टर और निर्मल दरोगा समेत अन्य को जिम्मेदार ठहराया है। सुसाइड नोट में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि “मेरी मौत के लिए पुलिस और विपक्षी लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने बार-बार ₹75,000 की मांग की और मुझे झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी।”
परिवार वालों का आरोप है कि जब वे इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंचे, तो पुलिस ने आनाकानी शुरू कर दी। उन पर कथित तौर पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि अगर वे शिकायत से आरोपी पुलिसकर्मियों के नाम हटा दें, तभी उनकी प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाएगी।
आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने इस घटना पर गहरा रोष व्यक्त किया और उत्तर प्रदेश सरकार से तत्काल न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टैग करते हुए सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं:
1.मामले में शामिल सभी आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त धाराओं में तत्काल FIR दर्ज की जाए।
2.दोषी पुलिसकर्मियों को तुरंत निलंबित कर गिरफ्तार किया जाए।
3.पीड़ित परिवार को कम से कम ₹50 लाख का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।
4.मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया जाए या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
इस घटना के बाद दलित-बहुजन समाज और स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और पीड़ित परिवार को कब तक न्याय मिल पाता है।
इस मामले में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, और यह घटना प्रदेश में पुलिस सुधार की आवश्यकता को और भी प्रकट करती है।
