इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
कर्नाटक के सबसे हाशिए पर खड़े 59 घुमंतू दलित समुदायों ने आज जंतर मंतर पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। करीब 300 से अधिक लोगों ने भाग लिया और केंद्र सरकार एवं कर्नाटक सरकार से शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 1% आंतरिक आरक्षण की मांग की।
ये समुदाय न्यायमूर्ति नागमोहन दास आयोग की रिपोर्ट में ‘सबसे पिछड़े’ के रूप में सूचीबद्ध हैं। आयोग ने इन समुदायों को 1% आरक्षण देने की सिफारिश की थी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार ने इस सिफारिश को खारिज कर इन समुदायों को प्रमुख अनुसूचित जाति समूहों में मिला दिया। इससे इनकी प्रतिनिधित्व की संभावना समाप्त हो गई।
प्रदर्शनकारियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और नारेबाजी के माध्यम से अपनी मांगों को रेखांकित किया। दिल्ली पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, लेकिन इससे आंदोलन की आंच नहीं टूटी। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से हस्तक्षेप की मांग की।
राष्ट्रीय जन आंदोलन (NAPM) ने भी कांग्रेस नेतृत्व से अपील की कि कर्नाटक के इन घुमंतू दलित समुदायों के लिए 1% आंतरिक आरक्षण सुनिश्चित किया जाए। NAPM का कहना है कि यह कदम सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
कर्नाटक सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए 6:6:5 आरक्षण फार्मूला लागू किया है, जिसमें प्रमुख समुदायों को अधिक आरक्षण दिया गया है। इससे उप-समूहों में असंतोष बढ़ा है, खासकर उन समुदायों में जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं।
भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा और पिछड़े समुदायों के अधिकारों पर चोट पहुंचेगी।
कर्नाटक के इन घुमंतू दलित समुदायों का यह संघर्ष “समानता और न्याय की दिशा में निरंतर प्रयासों” का प्रतीक बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन समुदायों की मांग नहीं मानी गई, तो सामाजिक असंतोष और आंदोलन बढ़ सकते हैं।
