डीएसपी की नौकरी छोड़ सियासत के शिखर तक का सफर: राम विलास पासवान

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

मदर ऑफ ऑल इलेक्शन यानि बिहार चुनाव का सुर चुनाव आयोग ने फूंक दिया है। तमाम राजनीतिक दल मतदाताओं को का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए एड़ी चोट लगा रहे। सियासी बैठकों का दौर उरूज पे है, कहीं सीट बंटवारे की खींचतान तो कहीं मतदाताओं को लुभाने और सामाजिक समीकरण साधने के लिए घोषणा पत्र पर बहस तथा दाव पेंच लगाए जा रहे हैं।
इस चुनावी हलचल के बीच बिहार की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे राम विलास पासवान को याद किया जाना बेहद जरूरी है।
जिन्होंने बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट का नारा दिया था। राम विलास पासवान की चुनावी राजनीतिक समझ इस कदर थी कि वो पहले भांप लेते थे कि हवा का रुख किस ओर होने वाला है और उसी रुख की तरफ वो अपना क़दम बढ़ाते थे, जिसके कारण उन्हें राजनीति का मौसम विज्ञान कहा जाता है।
देश आज़ादी के लगभग मुहाने पर था संघर्ष उरूज पर था, उसी दौर में 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले के शहरबन्नी गांव के एक दलित परिवार में राम विलास पासवान का जन्म हुआ। जिस वक्त दलित समाज के साथ छुआछूत और सामाजिक रूप से हाशिए पर था उस वक्त किसे पता था कि इस समाज का लड़का एक बार विधायक और 11 बार संसद सदस्य सहित 6 अलग अलग प्रधानमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्री बनेंगे।

शिक्षा और डीएसपी से राजनीति तक

उनका परिवार शिक्षा के महत्व को समझते थे इसलिए चैलेंजेस के बावजूद राम विलास को पढ़ाने का निर्णय लिया। शुरुआती पढ़ाई गांव के आसपास हुई, उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई कोसी कॉलेज से तथा पटना यूनिवर्सिटी से एलएलबी एवं मास्टर्स की डिग्री हासिल की।
वो पढ़ाई में बचपन से ही तेजतर्रार थे और खूब मेहनत से पढ़ते थे साल 1969 में संघर्ष और मेहनत रंग लाई। उनका चयन डीएसपी के पद पर हुआ। उस समय बिहार में मध्यावधि चुनाव का माहौल था, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने राम विलास पासवान को टिकट देकर उन्हें दुविधा में डाल दिया। उनके एक मित्र ने सुझाव दिया कि गवर्नमेंट बनना है या सर्वेंट। ये शब्द बाद मशहूर हो गए।
राम विलास पासवान ने निर्णय लिया कि गवर्नमेंट बनना है, डीएसपी की नौकरी छोड़कर चुनाव लड़े और पहली बार में ही विधायक बनकर राजनीतिक करियर की शुरुआत की।

जेपी आंदोलन और आपातकाल

विधायक बनने के बाद राम विलास पासवान समाजवादी नेता राम सजीवन के क़रीब होते गए एवं पटना का छात्र आंदोलन, जिसे जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा देकर इंकलाब बरपा कर दिया था। इस आंदोलन में जय प्रकाश नारायण के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले एवं उनके नेतृत्व में सक्रिय भागीदारी निभाई।
इस आंदोलन की गूंज दिल्ली तक पहुंची और इंदिरा गांधी की सरकार के लिए संभालना मुश्किल हो गया। इस बीच इमरजेंसी की घोषणा कर सबको चौका दिया और देश के तमाम विरोधी नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया। जिसमें राम विलास पासवान का भी नाम शामिल हैं।

रिकॉर्ड जीत और गिनीज बुक

आपातकाल खत्म होने के बाद जब 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो इंदिरा के विरोध में तमाम बड़े नेता जनता पार्टी का गठन कर यूनिटी के साथ चुनाव लड़े। राम विलास पासवाल को जनता पार्टी ने हाजीपुर लोकसभा सीट से टिकट देकर उम्मीदवार बनाया। यह चुनाव उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। राम विलास पासवान ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को लगभग सवा चार लाख के वोटों के रिकॉर्ड अंतर से हराया।
यह जीत न केवल भारत में, बल्कि दुनिया में किसी भी चुनाव में सबसे बड़े अंतराल से हुई जीत थी। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया।
1989 लोकसभा चुनाव में इसके बाद 1984 और 2009 को छोड़कर 2014 तक हाजीपुर लोकसभा चुनाव जीतते रहे। 1989 में, राम विलास पासवान ने हाजीपुर से फिर जीत दर्ज की और इस बार उन्होंने खुद के पुराने विश्व रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 5 लाख के अधिक मतों के अंतर से जीतने का एक और विश्व रिकॉर्ड खड़ा कर दिया।
इस बार उन्हें वीपी सिंह सरकार के मंत्रिमंडल में जगह मिली और श्रम और कल्याण मंत्रालय के पद काबिज़ हुए इसके अलावा नरेंद्र मोदी समेत पांच प्रधानमंत्री के साथ बतौर मंत्री अपनी सेवा दी।

दलित सेना और सामाजिक विरासत

राम विलास पासवान ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन वंचितों, शोषितों और दलितों के हक़ की लड़ाई को समर्पित किया। 1983 में उन्होंने दलित सेना बनाई, जिसका मकसद दलितों के हितों के लिए संघर्ष और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करना था। वे अक्सर राम मनोहर लोहिया की कविता के अंश पाठ करते थे, जैसे:

“अंग्रेज यहाँ से चले गए, अंग्रेज़ी को भी जाना होगा…
राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी का हो संतान,
बिरला या गरीब का बेटा—सबकी शिक्षा एक समान।”

SC/ST एक्ट लागू कराने और आरक्षण दिलाने में उनकी भूमिका ने उन्हें दलितों का मसीहा बना दिया। केंद्रीय मंत्री रहते गरीबों तक जनवितरण प्रणाली से राशन पहुँचाने का काम किया। इतना ही नहीं, उन्होंने उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की मांग उठाकर दलितों की लड़ाई को नए मुकाम तक पहुँचाया।

राम विलास पासवान की दलगत यात्रा लंबी रही, 1977 में जनता पार्टी, फिर जनता पार्टी (सेक्युलर), लोक दल और जनता दल से होते हुए 1999 में कुछ समय के लिए जेडीयू का हिस्सा बने।
28 नवंबर 2000 को जेडीयू छोड़कर उन्होंने खुद की लोक जन शक्ति पार्टी का गठन किया जहां उन्होंने दलित और पिछड़ों की आवाज़ मजबूत की।
इसके बाद राम विलास पासवान अपनी पार्टी के साथ कभी एनडीए गठबंधन तो कभी यूपीए गठबंधन के साथ रहे जहां उन्होंने किंग मेकर की भूमिका निभाई। इस गठबंधन की राजनीति की समझ और हुनर ने उन्हें भारतीय राजनीति का मौसम विज्ञान बना दिया। क्योंकि छह अलग-अलग प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट में मंत्री रहकर उन्होंने हमेशा सत्ता में अपनी जगह बनाए रखी।

राम विलास पासवान 2014 में पहली बार और 2019 में दूसरी बार राज्यसभा पहुंचे। आज ही के दिन 8 अक्टूबर 2020 को राम विलास पासवान का निधन हो गया। उस समय वे न सिर्फ राज्यसभा सांसद थे, बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री के रूप में भी कार्यरत थे।यानी, पासवान ने अंतिम सांस तक सक्रिय राजनीति और केंद्र सरकार—दोनों में अपनी अहम मौजूदगी बनाए रखी।

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