मौलाना महमूद मदनी ने केंद्र व न्यायपालिका पर साधा निशाना: कहा- अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हो रहा हमला, दमन पर होगा जिहाद

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने शनिवार को भोपाल में आयोजित धार्मिक–सामाजिक कार्यक्रम में केंद्र सरकार और न्यायपालिका पर तीखा हमला बोला।

मदनी ने कहा कि बाबरी मस्जिद विवाद, त्रि‑तलाक और अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े मामले “सरकार के दबाव में” चलाए जा रहे हैं। उनका कहना था कि इन फैसलों ने संविधान में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।

उन्होंने Places of Worship Act, 1991 का हवाला देते हुए कहा, “15 अगस्त 1947 की स्थिति तय है, लेकिन मंदिर-मस्जिद विवादों में अभी भी सर्वे और दावे जारी हैं। यह संविधान और कानून का खुला अपमान है।”

सुप्रीम कोर्ट पर भी मदनी ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा “सुप्रीम कोर्ट तभी तक ‘सुप्रीम’ कहलाएगा जब तक संविधान सुरक्षित रहेगा। अगर ऐसा नहीं होगा, तो इसका नाम सुप्रीम रखना अनुचित है।”

मदनी ने जिहाद की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा, “जिहाद हमेशा पवित्र और दूसरों की भलाई के लिए होता है। लेकिन आज इसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसी बातें धर्म और समाज को तोड़ने वाली हैं। अगर दमन होगा, तो जिहाद होगा।”

उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से करें।

भाजपा नेतृत्व ने मौलाना मदनी के बयानों को संवेदनशील और ‘provocative’ बताया। मदनी ने जवाब में कहा कि यह केवल मुसलमानों का मामला नहीं है, बल्कि पूरे लोकतंत्र और संविधान से जुड़ा है।

Places of Worship Act, 1991 के अनुसार स्वतंत्रता (15 अगस्त 1947) से पहले किसी भी धार्मिक स्थल का धार्मिक चरित्र बदलना प्रतिबंधित है। मदनी ने ज्ञानवापी, मथुरा और अजमेर जैसे हालिया विवादों का हवाला दिया और कहा कि अदालतें इस कानून को दरकिनार कर रही हैं। इससे मुस्लिम समुदाय और संविधान दोनों को खतरा है।

मौलाना मदनी का यह बयान सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा है। उनका कहना है कि अगर सरकार और न्यायपालिका मिलकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अंकुश लगाती हैं, तो देश के धर्मनिरपेक्षता और न्याय पर भरोसा कमजोर होगा।

मदनी ने स्पष्ट किया कि मुसलमानों को अपने हक के लिए खड़े होना चाहिए — लेकिन शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से, सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक।

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