क्या CAA विरोध ‘आतंकी कृत्य’ था? 7 कार्यकर्ताओं की जमानत पर SC का फैसला सुरक्षित, 5 साल से जेल में हैं उमर-शरजील

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध से जुड़े 2020 के दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात कार्यकर्ताओं की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इन कार्यकर्ताओं पर कड़े गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत आरोप लगे हैं और ये पिछले पाँच साल से अधिक समय से हिरासत में हैं।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने मंगलवार और बुधवार को बचाव पक्ष और दिल्ली पुलिस का विस्तृत पक्ष सुनने के बाद यह फैसला सुरक्षित रखा। जिन प्रमुख कार्यकर्ताओं की किस्मत का फैसला अब शीर्ष अदालत के हाथ में है, उनमें उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। पुलिस ने अपने तर्कों में कहा कि ये दंगे “सहज नहीं” थे, बल्कि “पूर्व-नियोजित, सुनियोजित, और कोरियोग्राफ की गई हिंसा” थी, जिसका उद्देश्य देश की संप्रभुता पर हमला करना था।

एएसजी राजू ने जोर देकर कहा कि आरोपियों के भाषणों ने न केवल हिंसा भड़काई, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी में “आवश्यक आपूर्ति को बाधित किया”, जो कि “एक स्पष्ट आतंकी कृत्य” (A clear terrorist act) है।

पुलिस ने यह भी तर्क दिया कि एक सह-आरोपी (जैसे शरजील इमाम) के कृत्य और भाषणों को अन्य आरोपियों (जैसे उमर खालिद) के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि वे एक ही बड़ी साजिश का हिस्सा थे।

जमानत की मांग कर रहे कार्यकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकीलों ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं और ट्रायल शुरू होने में अभी लंबा समय लग सकता है।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ‘अप्रिय’ या ‘असहज’ भाषण देना अपने आप में यूएपीए के प्रावधानों को आकर्षित नहीं करता। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल शांतिपूर्ण विरोध के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर रहे थे। शरजील इमाम के वकील ने यह भी बताया कि उन्हें तो हिंसा भड़कने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और उन पर दंगों में सीधे भाग लेने का कोई आरोप नहीं है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने फैसले को सुरक्षित रखते हुए अभियोजन पक्ष और याचिकाकर्ताओं के वकीलों को 18 दिसंबर तक अपने सभी दस्तावेज़ और दलीलों का संकलन जमा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के निर्देशों और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह उम्मीद जताई जा रही है कि शीर्ष अदालत जल्द ही अपना फैसला सुना सकती है, संभवतः शीतकालीन अवकाश (जो कि 19 दिसंबर के आसपास शुरू होता है) से पहले। इस फैसले पर न केवल कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों की निगाहें टिकी हैं, बल्कि यह यूएपीए जैसे कड़े कानून की व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है।

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