बिहार में कथित तौर पर धार्मिक पहचान और “बांग्लादेशी” होने के आरोप में हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने गंभीर चिंता जताई है। आयोग के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद गुलाम रसूल बलियावी ने पुलिस महानिदेशक (DGP) बिहार को पत्र लिखकर इन घटनाओं पर तत्काल अंकुश लगाने, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की मांग की है।
दिनांक 6 जनवरी 2026 को जारी पत्र में आयोग ने कहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, अख़बारों और न्यूज़ चैनलों में प्रसारित ख़बरों के माध्यम से राज्य के विभिन्न ज़िलों में लगातार मॉब लिंचिंग की चिंताजनक घटनाएं सामने आ रही हैं। आयोग के अनुसार हाल के दिनों में नालंदा ज़िले में कपड़ा व्यवसायी मो. अतहर हुसैन की लिंचिंग के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई, वहीं मुजफ्फरपुर में एक मुस्लिम बुज़ुर्ग पर लिंचिंग का प्रयास किया गया। इसके अलावा सुपौल ज़िले के मो. मुर्शिद आलम को मधुबनी में मज़दूरी के दौरान कथित तौर पर “बांग्लादेशी” बताकर भीड़ ने बेरहमी से पीटा, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
आयोग ने अपने पत्र में कहा कि इस तरह की घटनाएं सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता को गहरी चोट पहुंचा रही हैं। अल्पसंख्यकों और शोषित वर्गों में भय, असुरक्षा और न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास की स्थिति पैदा हो रही है, जो राज्य के लिए बेहद चिंताजनक है।
पत्र में 2018 के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा गया है कि शीर्ष अदालत ने मॉब लिंचिंग पर रोक के लिए स्पष्ट निवारक, उपचारात्मक और दंडात्मक दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें प्रत्येक ज़िले में एसपी रैंक के नोडल अधिकारी की नियुक्ति, घटना की सूचना मिलते ही तत्काल FIR दर्ज करने, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली सामग्री पर सख्ती, दोषी पुलिस अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और पीड़ितों को मुआवज़ा देने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
आयोग ने याद दिलाया कि वर्ष 2018 में इन्हीं निर्देशों के तहत DGP कार्यालय द्वारा सभी ज़िलों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए थे, जिसके बाद मॉब लिंचिंग की घटनाओं में काफी कमी आई थी। लेकिन मौजूदा हालात में फिर से घटनाओं में बढ़ोतरी को देखते हुए सख्त कदम उठाने की ज़रूरत है।
बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने DGP से आग्रह किया है कि वे अपने स्तर से एक स्पष्ट एडवाइजरी जारी करें, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कराएं और की गई कार्रवाई की जानकारी आयोग को दें, ताकि राज्य में कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को बहाल किया जा सके।
