भारत की वामपंथी पार्टियाँ CPI(M), CPI और CPI(ML)-लिबरेशन ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित “Board of Peace for Gaza” में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित भागीदारी के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है। इन दलों का कहना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर कर गाजा के पुनर्निर्माण को लाभ-केंद्रित बना सकता है।
CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा, “यह बोर्ड गाजा के पुनर्निर्माण के बजाय फिलिस्तीनी भूमि के विनाश को व्यापारिक लाभ में बदलने का प्रयास है। शांति योजना में इजरायल के कब्जे को समाप्त करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।” उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि भारत को अपनी उपनिवेश विरोधी परंपरा के अनुरूप फिलिस्तीनी लोगों के पक्ष में रुख रखना चाहिए।
CPI के राज्यसभा सांसद प. संतोष कुमार ने कहा, “ट्रंप को वैश्विक पुलिस का अधिकार नहीं है। भारत को किसी भी शक्तिशाली देश के दबाव में नहीं आना चाहिए। मोदी सरकार को महात्मा गांधी की विरासत के अनुरूप न्यायपूर्ण और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करना चाहिए।”
CPI(ML)-लिबरेशन ने कहा कि प्रस्तावित बोर्ड UN की जगह लेने और सभी अधिकारों को अमेरिका में केंद्रीकृत करने की कोशिश है। पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार भारत की ऐतिहासिक उपनिवेश विरोधी विदेश नीति और वैश्विक दक्षिण के साथ सॉलिडैरिटी को छोड़कर अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर एक औपनिवेशिक शक्ति संरचना को मान्यता दे सकती है। इसे पार्टी ने “शर्मनाक विश्वासघात” करार दिया।
पार्टी ने यह भी चेतावनी दी कि अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बावजूद गाजा में नागरिकों की मौत, बुनियादी ढांचे का विनाश और भुखमरी जैसी स्थितियाँ निरंतर जारी हैं। उन्होंने कहा कि इस बोर्ड में शामिल होने से भारत फिलिस्तीनी लोगों के संघर्ष का समर्थन करने में विफल होगा।
ट्रंप ने भारत समेत लगभग 60 देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता भेजा है। बोर्ड का उद्देश्य गाजा में शांति स्थापना, शासन व्यवस्था और पुनर्वास का मार्गदर्शन बताई जा रही है। भारत ने अभी तक भागीदारी पर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया है और इसे कूटनीतिक संवेदनशीलता और अंतरराष्ट्रीय वैधानिकता के दृष्टिकोण से परखा जा रहा है।
वामपंथी दलों ने सरकार से अपील की है कि भारत को अपनी शांति-प्रधान और गैर-औपनिवेशिक विदेश नीति बनाए रखनी चाहिए और फिलिस्तीनी लोगों के अधिकार और स्वाधीनता के समर्थन में स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
