लाल झंडों से पटा दरभंगा: भाकपा–माले के 12वें राज्य सम्मेलन में बुलडोज़र राज और लोकतंत्र पर हमलों के खिलाफ गरजा विपक्ष, दीपंकर बोले “यह दूसरी आज़ादी की लड़ाई”

बिहार की राजनीतिक और सामाजिक हलचलों के बीच दरभंगा में शुरू हुए Communist Party of India (Marxist–Leninist) Liberation के 12वें बिहार राज्य सम्मेलन ने पहले ही दिन देश की मौजूदा राजनीति, लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय के सवालों को केंद्र में ला दिया। लहेरियासराय के पोलो मैदान स्थित सभागार में आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में वामपंथी राजनीति, जनआंदोलनों और विपक्षी दलों की साझा रणनीति पर जोर देते हुए भाजपा सरकार की “बुलडोज़र राजनीति” और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कथित हमलों के खिलाफ व्यापक जनप्रतिरोध का आह्वान किया गया।

सम्मेलन की शुरुआत जनआंदोलनों, सामाजिक न्याय और प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना के प्रतीकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई। Baba Nagarjun, B. R. Ambedkar, Chandra Shekhar Azad, Mahatma Gandhi और Ram Manohar Lohia सहित कई जननायकों और सांस्कृतिक हस्तियों को याद करते हुए नेताओं और प्रतिनिधियों ने उनके संघर्षों से प्रेरणा लेकर लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।

भाजपा के बुलडोज़र राज के खिलाफ लड़ाई दूसरी आज़ादी की जंग”

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में “बुलडोज़र राज के खिलाफ लोकतंत्र का सवाल” विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए भाकपा–माले के महासचिव Dipankar Bhattacharya ने केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि देश की जनता को “आज़ादी की एक नई लड़ाई” लड़नी होगी।

दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि देश में “सुशासन” की जगह अब खुलेआम बुलडोज़र चलाने की राजनीति हो रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सत्ता का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को बचाने की लड़ाई अब और तेज़ करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन, किसान आंदोलन और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए आंदोलनों ने देश में लोकतांत्रिक प्रतिरोध की नई धारा पैदा की है। उन्होंने विपक्षी दलों और जनसंगठनों से व्यापक एकजुटता कायम करने की अपील की।

दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि “हम चुनाव हारे हैं, हिम्मत नहीं हारे हैं” और भाजपा की “बुलडोज़र राजनीति” को रोकने के लिए जनता की ताकत को संगठित करना होगा। उन्होंने Bhagat Singh का हवाला देते हुए साम्राज्यवाद और उसके “देशी सहयोगियों” के खिलाफ संयुक्त संघर्ष की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

विपक्षी नेताओं ने सरकार पर साधा निशाना

सम्मेलन के खुले सत्र में विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं ने भी हिस्सा लिया और केंद्र तथा राज्य सरकारों की नीतियों की आलोचना की।

Mangani Lal Mandal ने बिहार में बढ़ती गरीबी, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान धनबल का इस्तेमाल हुआ, लेकिन प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की।

कांग्रेस नेता Madan Mohan Jha ने कहा कि लोकतंत्र, पत्रकारिता और असहमति रखने वालों पर खतरा बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को संगठित संघर्ष के जरिए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी।

काराकाट से सांसद Rajar Ram Singh ने परिसीमन और चुनावी बदलावों को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि संविधान और लोकतंत्र पर खतरे के संकेत दिखाई दे रहे हैं।

वहीं माले नेता Meena Tiwari ने महिलाओं, शिक्षकों और सामाजिक आंदोलनों पर बढ़ते दमन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि महिलाओं ने अपने अधिकार संघर्ष से हासिल किए हैं और वे पीछे हटने वाली नहीं हैं।

लाल झंडों और नारों से गूंजा दरभंगा

सम्मेलन के दौरान लहेरियासराय चौक से सम्मेलन स्थल तक निकाले गए विशाल मार्च ने शहर का राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल दिया। लाल झंडों, जनगीतों और नारों के बीच निकले इस मार्च में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं, प्रतिनिधियों और समर्थकों ने भाग लिया।

“बुलडोज़र राज नहीं चलेगा”, “लोकतंत्र पर हमला बंद करो” और “रोजगार और शिक्षा हमारा अधिकार” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंजता रहा। मार्च के जरिए सम्मेलन का राजनीतिक संदेश साफ तौर पर सामने आया — लोकतांत्रिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा।

सम्मेलन स्थल पहुंचने पर शहीद वेदी पर जनआंदोलनों और पार्टी के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। दो मिनट का मौन रखकर उनके संघर्षों और बलिदानों को याद किया गया।

जनसंघर्ष और प्रगतिशील संस्कृति का प्रतीक बना सम्मेलन परिसर

सम्मेलन परिसर को जनसंघर्षों और प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना की थीम पर सजाया गया है। सम्मेलन नगर का नामकरण कथाकार Phanishwar Nath Renu और जनकवि Baba Nagarjun के नाम पर किया गया है, जिन्हें बिहार की जनपक्षधर साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।

पंडाल को पार्टी नेताओं राजाराम, रामदेव वर्मा और लक्ष्मी पासवान की स्मृति को समर्पित किया गया है, जबकि मंच का नामकरण मधु मिश्रा, दयमंती सिन्हा और शहिदा खातून के नाम पर किया गया। इसके अलावा पार्टी के दिवंगत नेताओं विशेश्वर यादव, मनोज यादव, इमानुएल हक और विष्णुदेव यादव की स्मृति में प्रवेश द्वार बनाए गए हैं।

पूरे परिसर को लाल झंडों, पोस्टरों और जनसंघर्षों की तस्वीरों से सजाया गया है। बुलडोज़र राज, सांप्रदायिकता, बेरोज़गारी और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमलों के खिलाफ संदेश देने वाले पोस्टर सम्मेलन के प्रमुख आकर्षण बने हुए हैं।

वैज्ञानिक सोच और तार्किक चेतना पर भी जोर

सम्मेलन में केवल राजनीतिक मुद्दों ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच और तार्किक चेतना के सवाल को भी प्रमुखता दी गई। पाखंड, अंधविश्वास और सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ वैचारिक संघर्ष को नई दिशा देने वाले इतिहासकार Ram Sharan Sharma, D. N. Jha और Radhakrishna Choudhary को भी श्रद्धापूर्वक याद किया गया।

तीन दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में बिहार की राजनीति, आगामी चुनावी रणनीति, सामाजिक न्याय, किसान–मजदूर आंदोलनों और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर कई महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रस्तावों पर चर्चा होने की संभावना है।

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