बॉम्बे हाईकोर्ट से PFI के तीन सदस्यों को ज़मानत,अदालत ने कहा “कराटे कैंप चलाना या भाषण देना आतंकवाद नहीं”

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े तीन अभियुक्तों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि मात्र किसी संगठन की बैठकों में भाग लेना, भाषण देना या कराटे जैसे शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के अंतर्गत आतंकवादी कृत्य नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति नितिन बी. सूर्यवंशी और संदीपकुमार सी. मोरे की खंडपीठ ने यह आदेश अभियुक्त सैय्यद फैसल सैय्यद खलील, अब्दुल हादी और शेख इरफ़ान शेख सलीम उर्फ़ इरफ़ान मिल्ली की ओर से दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए पारित किया। तीनों आरोपियों को पहले निचली अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया था।

खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब प्राथमिकी दर्ज हुई और अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया गया, उस समय पीएफआई को केंद्र सरकार द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अब तक कोई ऐसा ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह सिद्ध हो सके कि वे किसी आतंकवादी गतिविधि में संलिप्त थे।

यह मामला 21 सितंबर, 2022 को औरंगाबाद एटीएस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी पर आधारित है। शिकायत के अनुसार, नवंबर 2021 में चिकलठाणा क्षेत्र में ‘हेल्दी पीपल हेल्दी नेशन’ नाम से एक कराटे प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसमें मुस्लिम युवाओं को शारीरिक रूप से तैयार रहने के लिए प्रेरित किया गया।

प्राथमिकी में यह भी आरोप है कि इसी महीने कटकट गेट क्षेत्र में एक जनसभा में पीएफआई के जिला अध्यक्ष इरफ़ान मिल्ली तथा अन्य नेताओं ने सरकार के विरुद्ध भड़काऊ भाषण दिए और युवाओं से संगठन से जुड़ने की अपील की।

इसके अतिरिक्त, खुफिया एजेंसियों द्वारा जुलाई 2022 में प्राप्त सूचनाओं में यह दावा किया गया कि नारेगांव स्थित एक हॉल में गुप्त हथियार और शारीरिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए थे, जिनमें कथित तौर पर सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष के लिए युवाओं को प्रेरित किया गया।

खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा “मात्र सेमिनार, बैठकों या कराटे प्रशिक्षण में भाग लेने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अभियुक्तों ने आतंकवादी गतिविधियों में भाग लिया है।” अदालत ने यह भी कहा कि यद्यपि अभियुक्तों के पास से कुछ हथियार बरामद हुए हैं, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि इनका उपयोग किसी आतंकी घटना या सरकार को अस्थिर करने के प्रयास में किया गया।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने ट्रायल की धीमी प्रगति पर चिंता व्यक्त की। अभियोजन पक्ष अब तक 145 में से केवल पाँच गवाहों की गवाही दर्ज कर सका है, जबकि अभियुक्त दो वर्ष आठ माह से जेल में बंद हैं। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त ‘त्वरित न्याय’ के अधिकार का उल्लंघन माना।

खंडपीठ ने विशेष यूएपीए अदालत को निर्देश दिया है कि वह तीनों अभियुक्तों को सशर्त जमानत प्रदान करे। शर्तों में पासपोर्ट जमा कराना, जांच में पूर्ण सहयोग करना तथा अदालत की अनुमति के बिना क्षेत्र न छोड़ना शामिल है।

यह फैसला आतंकवाद संबंधी मामलों में साक्ष्य आधारित कार्यवाही के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने यह संकेत दिया है कि कठोर कानूनों के प्रयोग में संतुलन आवश्यक है और किसी के विचार, संगठनों से जुड़ाव या असहमति को स्वतः आतंकवाद से नहीं जोड़ा जा सकता जब तक कि ठोस प्रमाण न हों।

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