पटना में बीटी एक्ट के खिलाफ बौद्ध धर्म का प्रदर्शन, मुज़फ्फरपुर से भीम आर्मी ने शुरू की ‘विरासत बचाओ, भारत बचाओ यात्रा’!शरफुद्दीन मोहम्मद कासमी की चेतावनी: “बौद्ध अधिकारों के लिए आखिरी सांस तक लड़ेंगे”

इंसाफ टाइम्स डेस्क

बोधगया मंदिर की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था बौद्ध अनुयायियों को सौंपने की मांग को लेकर पटना में बौद्ध धर्मावलंबियों ने बड़ा प्रदर्शन किया। मुख्यमंत्री आवास के सामने सैकड़ों प्रदर्शनकारी तेज धूप में बैठे रहे और बीटीएमसी एक्ट 1949 को रद्द करने की मांग की। इस दौरान, मुजफ्फरपुर से भीम आर्मी ने ‘विरासत बचाओ, भारत बचाओ यात्रा’ की शुरुआत की, जो अब राज्यव्यापी जन आंदोलन बन चुकी है।

बौद्ध भिक्षु और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

बौद्ध भिक्षुओं और सामाजिक संगठनों के नेताओं का कहना है कि 1949 में बना बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमिटी (बीटीएमसी) एक्ट बौद्ध अनुयायियों की धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। इस कानून के तहत मंदिर प्रबंधन समिति में नौ सदस्यों में से पांच गैर-बौद्ध हैं, जो बौद्धों को उनके ही पवित्र स्थल के संचालन से वंचित कर देते हैं।

भीम आर्मी की चेतावनी

भीम आर्मी के राज्य सचिव शरफुद्दीन मोहम्मद कासमी उर्फ लालू भाई ने स्पष्ट रूप से कहा कि “यह कानून बौद्ध अनुयायियों के अधिकारों का उल्लंघन है। हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। जब तक यह कानून रद्द नहीं होता, हमारा आंदोलन जारी रहेगा। सरकार को चेतावनी है कि यदि बौद्धों की भावनाओं का सम्मान नहीं किया गया तो यह आंदोलन पूरे देश में फैल सकता है।”

नेताओं की भागीदारी

इस जन आंदोलन का नेतृत्व आज़ाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद, भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन सिंह, बिहार अध्यक्ष अमर ज्योति, कम्बल बालियान और जोहर आज़ाद जैसे प्रमुख नेता कर रहे हैं। बोधगया में बौद्ध भिक्षु भंते आनंद के नेतृत्व में 12 फरवरी से लगातार प्रदर्शन जारी है।

मुजफ्फरपुर से यात्रा की शुरुआत

‘विरासत बचाओ, भारत बचाओ यात्रा’ की शुरुआत मुजफ्फरपुर से हुई, जिसमें भीम आर्मी और आज़ाद समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इस यात्रा का उद्देश्य बिहार और देश भर के लोगों को बीटीएमसी एक्ट की अन्यायपूर्ण धाराओं के बारे में जागरूक करना और बौद्धों की मांगों को जनता और सरकार के सामने रखना है।

क्या है बीटीएमसी एक्ट 1949

यह कानून बिहार सरकार ने बोधगया मंदिर के प्रबंधन के लिए बनाया था, लेकिन बौद्ध अनुयायियों का कहना है कि इस कानून के जरिए उनकी धार्मिक स्वायत्तता को कमजोर किया गया है। उनका कहना है कि जैसे अन्य धार्मिक स्थलों का संचालन उसी धर्म के अनुयायी करते हैं, वैसे ही बोधगया मंदिर का प्रशासन भी पूरी तरह बौद्धों के हाथ में होना चाहिए।

संघर्ष का ऐलान

भीम आर्मी और आज़ाद समाज पार्टी ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे। शरफुद्दीन कासमी ने कहा, “हम अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर चुके हैं। यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार इस कानून को रद्द नहीं करती।”

बिहार में बौद्ध अधिकारों की यह लड़ाई अब एक संगठित आंदोलन बन चुकी है। यह केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ एक सामाजिक आंदोलन बन चुका है। सरकार के सामने अब एक सीधी मांग है—बोधगया मंदिर की पूर्ण स्वायत्तता और बीटीएमसी एक्ट 1949 की समाप्ति।

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