
दिल्ली (इंसाफ़ टाइम्स डेस्क) चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया डी.वाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के अपने अंतिम फ़ैसले में बुल्डोजर कार्रवाई कि सख़्त निंदा किया है, उन्होंने कहा कि “कानून के शासन के तहत बुलडोजर न्याय बिल्कुल अस्वीकार्य है. अगर इसे अनुमति दी गई तो अनुच्छेद 300ए के तहत संपत्ति के अधिकार की संवैधानिक मान्यता एक डेड लेटर बनकर रह जाएगी”
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि “नागरिकों की आवाज को उनकी संपत्तियों और घरों को नष्ट करने की धमकी देकर दबाया नहीं जा सकता”
उन्होंने कहा कि “अवैध अतिक्रमणों या अवैध निर्माण को हटाने के लिए कार्रवाई करने से पहले राज्य को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, कानून के शासन के तहत बुलडोजर न्याय बिल्कुल अस्वीकार्य है”
सीजेआई ने कहा “अधिकारी जो इस तरह की गैरकानूनी कार्रवाई को अंजाम देते हैं या मंजूरी देते हैं, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए, उनके द्वारा कानून का उल्लंघन करने पर आपराधिक प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, सार्वजनिक अधिकारियों के लिए सार्वजनिक जवाबदेही होनी चाहिए”
सीजेआई ने अपने फ़ैसले में कहा “बुलडोजर के माध्यम से न्याय न्यायशास्त्र की किसी भी सभ्य प्रणाली के लिए ठीक नहीं है, गंभीर खतरा है कि अगर राज्य के किसी भी विभाग या अधिकारी द्वारा गैरकानूनी व्यवहार की अनुमति दी जाती है, तो बाहरी कारणों से नागरिकों की संपत्तियों को चुनिंदा प्रतिशोध के रूप में ध्वस्त कर दिया जाएग”
मालूम हो कि चीफ़ जस्टिस की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट में 2019 में उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में एक घर को ध्वस्त करने से संबंधित मामले में फैसला सुनाया जा रहा था,और ये फ़ैसला चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया डी.वाई चंद्रचूड़ का आखिरी फैसला था