इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
कोलकाता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के दो परिवारों को बांग्लादेश निर्वासित करने की केंद्र सरकार की कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए उन्हें चार सप्ताह के भीतर भारत लौटाने का आदेश दिया है। अदालत ने इस कार्रवाई को “जल्दबाजी में की गई और संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन” बताया।
निर्देशित परिवार में आठ महीने की गर्भवती सुनीली खातून, उनके पति दानिश शेख और उनका छोटा बेटा शामिल हैं। परिवार को 24 जून को दिल्ली में ‘पहचान सत्यापन अभियान’ के दौरान हिरासत में लिया गया था और दो दिन बाद बांग्लादेश भेज दिया गया। इनके पास भारतीय नागरिकता के दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें अवैध प्रवासी मानकर निर्वासित किया गया।
न्यायमूर्ति तपब्रतो चक्रवर्ती और रीतोब्रोतो कुमार मित्रा की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि उन्हें भारतीय उच्चायोग, ढाका के माध्यम से चार सप्ताह में भारत वापस लाने का निर्देश दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कार्रवाई में संविधान के अनुच्छेद 14, 20(3) और 21 का उल्लंघन हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की अपील को खारिज कर दिया गया। अदालत ने केंद्र से यह भी पूछा कि सुनीली खातून और उनके परिवार को बांग्लादेश भेजने में किन दस्तावेजों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस सांसद समीरुल इस्लाम ने इसे “बंगालियों की जीत” और “केंद्र की बंगाली विरोधी नीति पर अदालत का स्पष्ट रुख” बताया। वहीं भाजपा ने इसे “असाधारण मामला” करार देते हुए कहा कि अवैध प्रवास एक गंभीर समस्या है और इस पर पुनर्विचार किया जाएगा।
परिवार की छह वर्षीय बेटी अफरीना, जो बीरभूम में अपने दादा-दादी के पास थी, अपनी मां की वापसी का बेसब्री से इंतजार कर रही है। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि परिवार की वापसी प्रक्रिया में जल्दबाजी से बचा जाए और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाए।
यह मामला नागरिकता, मानवाधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करता है, और न्यायपालिका की लोकतंत्र में भूमिका को रेखांकित करता है।
