दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा स्नेहा देबनाथ का शव यमुना से बरामद: मानसिक दबाव या लापरवाही की भेंट चढ़ी ज़िंदगी?

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

दिल्ली विश्वविद्यालय में गणित ऑनर्स की पढ़ाई कर रही 19 वर्षीय छात्रा स्नेहा देबनाथ का शव रविवार देर रात यमुना नदी से बरामद किया गया। त्रिपुरा निवासी यह छात्रा पिछले 8 दिनों से लापता थी। पुलिस के अनुसार, प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या का प्रतीत हो रहा है, लेकिन परिवार और समाज के कई वर्ग इस निष्कर्ष पर सवाल उठा रहे हैं।

स्नेहा सात जुलाई की सुबह एक दोस्त को रेलवे स्टेशन छोड़ने की बात कहकर निकली थी, लेकिन फिर वापस नहीं लौटी। उसी दिन दिल्ली के सराय रोहिला थाने में उसकी गुमशुदगी दर्ज कराई गई। पुलिस जांच के दौरान उसके कमरे से एक संदिग्ध “सुसाइड नोट” बरामद हुआ जिसमें उसने खुद को “जीवन का बोझ” बताया था।

13 जुलाई को उसका शव गीता कॉलोनी फ्लाईओवर के पास यमुना से बरामद किया गया। शव की पहचान परिजनों द्वारा की गई। पुलिस ने बताया कि अंतिम मोबाइल लोकेशन और कैब ड्राइवर के बयान के अनुसार, स्नेहा को सिग्नेचर ब्रिज के पास उतारा गया था, जिससे आशंका है कि उसने वहीं से कूदकर जान दी।

स्नेहा के परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि सिर्फ एक हस्तलिखित पर्ची को आत्महत्या का आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी बहन बिपाशा देबनाथ ने कहा “स्नेहा मानसिक रूप से मजबूत थी। अगर सिग्नेचर ब्रिज पर CCTV कैमरे काम कर रहे होते तो हम उसे समय रहते बचा सकते थे।”

स्नेहा दिल्ली विश्वविद्यालय में गणित की छात्रा थी, साथ ही डेटा साइंस का ऑनलाइन कोर्स भी कर रही थी और ऑस्ट्रेलियाई कंपनी में इंटर्नशिप कर रही थी। दोस्तों के अनुसार, वह अक्सर पढ़ाई और करियर को लेकर चिंतित रहती थी, लेकिन कभी भी खुदकुशी जैसे विचार नहीं व्यक्त किए थे।

पुलिस ने घटनास्थल से मिले तथ्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मोबाइल लोकेशन के आधार पर आत्महत्या का मामला दर्ज किया है।
डीसीपी (उत्तर) अंकित चौहान ने कहा “हम तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रहे हैं, अभी तक किसी बाहरी हमले के संकेत नहीं मिले हैं।”

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक साहा ने इस घटना को “दुखद और चिंताजनक” बताया है और दिल्ली प्रशासन से पूरी पारदर्शिता के साथ जांच कराने की अपील की है। उन्होंने परिजनों को हरसंभव सहायता देने का आश्वासन दिया है।

यह मामला एक बार फिर युवा छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक दबाव और शहरी जीवन की चुनौतीपूर्ण स्थितियों पर सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों को छात्रों के लिए काउंसलिंग व्यवस्था, तनाव-प्रबंधन प्रशिक्षण और समय पर हस्तक्षेप तंत्र विकसित करने की जरूरत है।

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