इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
गुजरात की राजनीति में मंगलवार को उस समय हलचल मच गई जब बोटाद से आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक उमेश मकवाणा ने पार्टी में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। पार्टी ने तत्काल प्रभाव से उन्हें पांच वर्षों के लिए निलंबित कर दिया है।
मकवाणा ने पार्टी के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव और विधानसभा में व्हिप के पद से इस्तीफा देते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी भी अब भाजपा और कांग्रेस की ही तरह बन चुकी है, जहाँ दलितों और पिछड़े वर्गों को केवल “वोट बैंक” के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन सत्ता और संगठन में उन्हें कोई सम्मानजनक स्थान नहीं दिया जाता।
“दलितों को टिकट दे देते हैं, लेकिन संसाधन नहीं। पटेल उम्मीदवारों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, जबकि दलित प्रत्याशियों को कर्ज लेकर चुनाव लड़ना पड़ता है,” मकवाणा ने कहा। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल ही में विसावदर उपचुनाव में गोपाल इटालिया जैसे उम्मीदवारों को विशेष प्राथमिकता दी गई, जबकि कादी सीट के दलित उम्मीदवार को संघर्ष करना पड़ा।
इसी बीच, पार्टी की गुजरात इकाई के अध्यक्ष इसुदान गढ़वी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि विधायक उमेश मकवाणा को “पार्टी-विरोधी गतिविधियों” और “गंभीर अनुशासनहीनता” के चलते पांच वर्षों के लिए निलंबित कर दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि मकवाणा के खिलाफ बोटाद क्षेत्र से भ्रष्टाचार की शिकायतें भी मिली थीं, जिनकी जांच की जा रही है।
हालांकि, मकवाणा ने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि वे अपने क्षेत्र की जनता से सलाह के बाद ही इस विषय पर कोई निर्णय लेंगे। फिलहाल वह स्वतंत्र विधायक के रूप में काम जारी रखेंगे।
बोटाद से विधायक बने उमेश मकवाणा कोली समुदाय से आते हैं और 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार आप के टिकट पर जीतकर आए थे। वे कोविड-19 काल में सामाजिक सेवा अभियानों के चलते चर्चा में आए थे और पार्टी के राज्य स्तरीय नेतृत्व में भी उन्हें स्थान दिया गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर पार्टी की ओबीसी और दलित मतदाताओं के बीच छवि पर पड़ सकता है। जहां एक ओर पार्टी ने संगठन में अनुशासन बनाए रखने का संदेश दिया है, वहीं दूसरी ओर मकवाणा के आरोपों ने सामाजिक न्याय और समावेशिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
