हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित एक सरकारी डिग्री कॉलेज में 19 वर्षीय दलित छात्रा की मौत ने देश की शैक्षणिक संस्थाओं में व्याप्त जातिगत भेदभाव, लैंगिक उत्पीड़न और प्रशासनिक उदासीनता पर एक बार फिर कठोर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। दलित अधिकार संगठनों का आरोप है कि छात्रा की मौत कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संस्थागत हिंसा का परिणाम है।
दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) और उसकी महिला इकाई महिला कामकाजी मंच (MKM) के अनुसार, छात्रा को महीनों तक रैगिंग, मानसिक प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इन गंभीर शिकायतों के बावजूद कॉलेज प्रशासन ने न तो समय पर हस्तक्षेप किया और न ही पीड़िता को सुरक्षा या मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई।
संगठनों का कहना है कि छात्रा बार-बार बीमार पड़ी, अस्पताल में भर्ती कराई गई और उसमें गहरे मानसिक तनाव के लक्षण साफ दिखाई दे रहे थे। इसके बावजूद कॉलेज द्वारा कोई संरचनात्मक या संवेदनशील पहल नहीं की गई। अधिकार समूह इसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा के साथ जीवन के अधिकार का खुला उल्लंघन मानते हैं।
छात्रा के पिता की शिकायत पर दर्ज प्राथमिकी (FIR) में तीन वरिष्ठ छात्राओं — हर्षिता, आकृति और कोमोलिका — पर रैगिंग, अपमान, धमकी और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं। पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से थी, जिससे मामला और भी संवेदनशील हो जाता है।
एफआईआर में कॉलेज के एक प्रोफेसर अशोक कुमार का नाम भी दर्ज है, जिन पर यौन रूप से अनुचित व्यवहार, शैक्षणिक सत्ता के दुरुपयोग और उत्पीड़न के गंभीर आरोप हैं। अधिकार संगठनों के मुताबिक, इस तरह का आचरण परिसर को असुरक्षित और भयावह बनाता है।
DASAM ने कहा कि यह मामला अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अंतर्गत आता है, जिसमें जाति आधारित अपमान, डराना-धमकाना और दलित महिला के खिलाफ यौन उत्पीड़न के प्रावधान शामिल हैं। साथ ही भारतीय न्याय संहिता के तहत दर्ज धाराओं को भी SC/ST एक्ट के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
संगठनों ने यह भी रेखांकित किया कि कानून के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है, इसके बावजूद अब तक गिरफ्तारी न होना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दलित अधिकार संगठनों ने कॉलेज प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि शिकायतों की अनदेखी ‘कर्तव्य की घोर उपेक्षा’ है, जो स्वयं SC/ST एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है। उन्होंने पीड़ित परिवार को सुरक्षा, मुआवजा और पुनर्वास देने की भी मांग की।
रैगिंग से जुड़े आरोप हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 के तहत आते हैं, जबकि प्रोफेसर पर लगे आरोप कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े कानून के दायरे में हैं।
संगठनों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग से स्वतंत्र जांच की मांग की है। इसके साथ ही कॉलेज प्राचार्य और राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, आरोपी प्रोफेसर की सेवा समाप्ति और नामजद छात्राओं के निष्कासन की मांग भी उठाई गई है।
अधिकार संगठनों का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों में दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं होती, बल्कि यह पूरे सामाजिक ढांचे की असंवेदनशीलता और विफलता को उजागर करती है। यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और सुरक्षा के दावों की कठोर परीक्षा है।
