✍️ अब्दुल रकीब नोमानी

हाल ही में महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आ गए हैं। जिनमें महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए और झारखंड में जेएमएम की अगुवाई में इंडिया गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। इसमें महाराष्ट्र के परिणाम सबसे ज्यादा चौंकाने वाले रहे। जहां एनडीए की भारी जीत से विपक्ष लगभग खत्म सा हो गया। इतनी बड़ी जीत की उम्मीद शायद एनडीए नेताओं ने भी की होगी। महाराष्ट्र विधानसभा में अब किसी भी विपक्षी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिल सकेगा। क्योंकि किसी भी विपक्षी दल के पास आवश्यक 29 विधायक नहीं हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के पास 20 विधायक हैं, शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के पास 10 और कांग्रेस के पास सिर्फ 16 विधायक हैं। इससे महाराष्ट्र में बिना नेता प्रतिपक्ष के पांच साल तक सरकार चलेगी।
इन्हीं चुनाव परिणामों के बाद महाराष्ट्र की वर्सोवा विधानसभा सीट सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा चर्चे में है। जहां से ‘बिग बॉस’ फेम एजाज खान ने चुनाव लड़ा। एजाज खान के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर लाखों की संख्या में फॉलोवर्स हैं – इंस्टाग्राम पर 56 लाख और फेसबुक पर 41 लाख, लेकिन इतनी लोकप्रियता के बावजूद उन्हें विधानसभा चुनाव में सिर्फ 155 वोट मिले। वहीं नोटा को उनसे कहीं अधिक 1297 वोट मिले। चुनाव परिणाम के बाद सोशल मीडिया पर एजाज खान को लेकर कई मीम्स वायरल किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर्स के बारे में लोग पूछ रहे हैं कि पैसे से फॉलोवर्स खरीदने से वोट नहीं मिलते हैं। सोशल मीडिया और राजनीति की दुनिया दोनों अलग-अलग चीज़ है।
इरोम शर्मिला का संघर्ष और वोटर की बेरुखी
एजाज खान को छोड़ दीजिये, भारतीय राजनीति में कई और उदाहरण मौजूद है जो अधिक गंभीर और विचारणीय है। जिनमें लोगों के उनके संघर्षों को आमजन वोट के रूप में सम्मान नहीं दे पाए, इनमें से एक – मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला है। इरोम शर्मिला एक ऐसी बहादुर महिला हैं. जिन्होंने अपने जीवन के 16 साल AFSPA के विरोध में भूख हड़ताल पर बिताए। जिंदगी के एक बड़े हिस्से को उन्होंने संघर्ष में गुजार दी। 2000 में मणिपुर के मालोम गांव में सेना की गोलीबारी में 10 निर्दोष नागरिकों की मौत के विरोध में उन्होंने अपना यह अनशन शुरू की थी। इसके बाद उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया और इस दौरान ट्यूब के जरिये उनके शरीर के अंदर खाना पहुंचाया जाता था। लेकिन इरोम शर्मिला अपने संकल्प से पीछे नहीं हटीं। उनके इस संघर्ष ने उन्हें “मणिपुर की आयरन लेडी” के रूप में पहचान दिलाई।
2016 में इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल समाप्त की और मणिपुर विधानसभा चुनाव 2017 में हिस्सा लेने का फैसला किया, इस सोच के साथ कि वे अपने उद्देश्य को राजनीतिक तरीके से आगे बढ़ा सकेंगे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आया तो उनके हिस्से में आए मात्र 90 वोट। जो कि नोटा के 147 वोटों से भी कम थे। यह परिणाम इरोम शर्मिला के लिए बहुत बड़ा आघात था। उन्हें जनता के बीच जिस सम्मान की उम्मीद थी। वो चुनाव परिणाम में नजर नहीं आया। इस घटना से आहत होकर उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी।
मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम शर्मिला का राजनीतिक संघर्ष और उसकी विफलता भारतीय राजनीति के उस पहलू को उजागर करता है जो दिखाता है कि नायकत्व और नेता बनने में एक बड़ा अंतर है। इरोम शर्मिला का जीवन और उनका बलिदान एक मिसाल है और उनकी हार भारतीय राजनीति में एक कड़वी हकीकत को दर्शाती है कि किस तरह हमारे समाज में सच्चे नायकों को कई बार अनदेखा कर दिया जाता है। इरोम शर्मिला की हार भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण सबक है। जो दिखाता है कि संघर्ष, बलिदान और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता जरूरी नहीं कि चुनावी जीत दिला सके। हमारे समाज में आज भी नायकों के प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है। समाज को यह समझना चाहिए कि त्याग और संघर्ष की कहानी केवल किताबों में नहीं रहनी चाहिए बल्कि उन्हें प्रासंगिक नेतृत्व में भी बदलना चाहिए। इसलिए जब इरोम शर्मिला जैसी बहादुर महिला को इस देश में विधायकी के चुनाव में सिर्फ 90 वोट मिल सकता है तो लाखों सोशल मीडिया फॉलोवर्स वाले एजाज खान को सिर्फ 155 वोट मिलना मेरे लिए अचरज की बात नहीं है।