केरल विधानसभा ने विशेष गहन संशोधन (SIR) के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, चुनाव आयोग से पुनः विचार की अपील

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

केरल विधानसभा ने सोमवार को एक ऐतिहासिक और सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया, जिसमें चुनाव आयोग (ECI) से राज्य में प्रस्तावित विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की अपील की गई। यह कदम राज्य में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और 2026 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उठाया गया है।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा प्रस्तुत इस प्रस्ताव में कहा गया कि SIR का उद्देश्य राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को अप्रत्यक्ष रूप से लागू करना प्रतीत होता है। उन्होंने बिहार में हुई SIR प्रक्रिया का हवाला देते हुए इसे “बहिष्करण की राजनीति” करार दिया और चेतावनी दी कि केरल में भी ऐसी प्रक्रिया की पुनरावृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरे की घंटी है।

जिन व्यक्तियों का जन्म 1987 के बाद हुआ है, उनसे माता-पिता की नागरिकता का प्रमाण मांगा गया है। 2003 के बाद जन्मे व्यक्तियों से दोनों माता-पिता का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की मांग की गई है। विधानसभा ने इसे सार्वभौमिक मताधिकार के सिद्धांत के खिलाफ बताया।

2002 की मतदाता सूची को आधार मानने को “अवैज्ञानिक” बताया गया, क्योंकि यह 23 साल पुरानी है और इसमें कई बदलाव हो चुके हैं।

SIR के लिए अधिकारियों की नियुक्ति स्थानीय निकाय चुनावों के लिए भी की गई है, जिससे दोनों प्रक्रियाओं में टकराव की स्थिति बन सकती है।

विधानसभा ने कहा कि बिना पर्याप्त दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पर मतदाताओं को बाहर करना संविधान द्वारा प्रदत्त मताधिकार का उल्लंघन है।

रूल 118 के तहत प्रस्तुत इस प्रस्ताव में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और विपक्षी कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) दोनों ने एकजुट होकर समर्थन किया। यह एक दुर्लभ राजनीतिक सहमति का प्रतीक है, जो राज्य की राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।

केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन केलकर ने 21 सितंबर को चुनाव आयोग से SIR को स्थगित करने की अपील की थी। उन्होंने अधिकारियों की दोहरी जिम्मेदारी को देखते हुए इसे व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण बताया था। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

केरल विधानसभा का यह प्रस्ताव न केवल राज्य की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देशभर में चुनावी सुधारों और मतदाता अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संदेश भी है। अब चुनाव आयोग पर यह जिम्मेदारी है कि वह इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे और सुनिश्चित करे कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पारदर्शी, समावेशी और संविधानिक अधिकारों के अनुरूप हो।

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