NCERT की नई किताब में मुग़लकाल पर सख़्त टिप्पणी: बाबर ‘निर्दयी’, औरंगज़ेब ‘मंदिरविरोधी’

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की नई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के इतिहास को लेकर तीखे शब्दों में टिप्पणियाँ की गई हैं। पुस्तक में बाबर को “निर्दयी विजेता”, अकबर को “क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण” तथा औरंगज़ेब को “मंदिर और गुरुद्वारों को नष्ट करने वाला शासक” बताया गया है।

NCERT की यह नई पाठ्यपुस्तक “Exploring Society: India and Beyond” के तहत जारी की गई है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (NCF-SE 2023) के अनुसार तैयार की गई है।

पुस्तक में यह उल्लेख किया गया है कि बाबर ने भारत में प्रवेश करते ही विरोधियों की हत्या कर खोपड़ियों के टावर बनवाए थे। वहीं अकबर को एक ओर धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण बताया गया है तो दूसरी ओर उसके शासनकाल में चित्तौड़गढ़ में 30,000 लोगों के नरसंहार का उल्लेख भी किया गया है। औरंगज़ेब के संदर्भ में लिखा गया है कि उसने काशी, मथुरा, सोमनाथ जैसे मंदिरों को तोड़ा और जिजिया कर दोबारा लागू किया।

NCERT ने पुस्तक में एक विशेष नोट शामिल किया है — “Note on Some Darker Periods in History”, जिसमें लिखा गया है कि अतीत की घटनाओं को पढ़ते समय वर्तमान पीढ़ियों को दोष नहीं देना चाहिए। पुस्तक का उद्देश्य छात्रों में आलोचनात्मक सोच को विकसित करना बताया गया है।

जहाँ कुछ शिक्षाविदों और सिख नेताओं ने इस बदलाव को ऐतिहासिक सच्चाई की पुनर्स्थापना बताया है, वहीं मुस्लिम संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना सुलेमान कासमी ने कहा कि यह “इतिहास को साम्प्रदायिक चश्मे से देखने का प्रयास है।” दूसरी ओर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव जगदीप सिंह काहलों ने कहा, “अब बच्चे जान सकेंगे कि मुगलों ने किस हद तक धार्मिक स्थलों का विध्वंस किया था।”

NCERT की ओर से इतिहास विशेषज्ञ और पाठ्यक्रम समिति के सदस्य माइकल डैनिनो ने बयान जारी कर कहा, “यह बदलाव शोध आधारित है और छात्रों को एक संतुलित और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण देने के लिए किया गया है। यह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है।”

नई पाठ्यपुस्तक के जरिए NCERT ने इतिहास के उन पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया है जो पहले या तो सीमित रूप से पढ़ाए जाते थे या नजरअंदाज कर दिए गए थे। हालांकि, यह बदलाव अब शिक्षा और राजनीति के बीच एक नई बहस को जन्म दे चुका है।

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