इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 3 मार्च 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट हटाने से पहले संबंधित क्रिएटर को नोटिस देना आवश्यक है। यदि क्रिएटर की पहचान संभव न हो, तो ही केवल मध्यस्थ (सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म) को नोटिस जारी किया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर इंडिया (एसएफएलसी) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी (सार्वजनिक रूप से सूचना तक पहुंच को अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की मांग की गई थी। एसएफएलसी का तर्क था कि वर्तमान व्यवस्था में सामग्री निर्माताओं को उनके पोस्ट हटाए जाने से पहले सूचित नहीं किया जाता, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “प्रथम दृष्टया, हमें लगता है कि नियम को इस तरह से पढ़ा जाना चाहिए कि जब भी कोई व्यक्ति पहचाना जा सके, तो उन्हें नोटिस दिया जाना चाहिए।” इससे यह सुनिश्चित होगा कि सामग्री हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिले।
केंद्र सरकार को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह कदम सामग्री मॉडरेशन ढांचे में संभावित सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिससे राज्य के हितों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन स्थापित हो सके।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत
एसएफएलसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि मौजूदा तंत्र प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने में विफल रहता है, क्योंकि सूचना देने वाले को सूचित नहीं किया जाता है। उन्होंने बताया कि नोटिस केवल सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स जैसे ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) और अन्य मध्यस्थों को भेजे जाते हैं, जबकि सामग्री के सर्जक को अनदेखा किया जाता है।
नियमों की समीक्षा की आवश्यकता
यह मामला सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2009 के नियम 8 और नियम 16 की समीक्षा की आवश्यकता को उजागर करता है। नियम 8 के तहत अधिकारी को सूचना प्रकाशित करने वाले व्यक्ति या मध्यस्थ की पहचान करने के लिए सभी उचित प्रयास करने होते हैं और उन्हें उपस्थित होने के लिए नोटिस देना होता है। वहीं, नियम 16 के तहत प्राप्त जानकारी या शिकायत के संबंध में सख्त गोपनीयता बनाए रखने का प्रावधान है, जिससे न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश कम हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर सामग्री मॉडरेशन के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।