सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग (ECI) पर गंभीर आरोप लगाते हुए इसे महिला, हाशिए पर रहे वर्ग और अल्पसंख्यकों को मतदाता सूची से बाहर करने वाला एक राष्ट्रीय स्तर का संकट करार दिया है। पार्टी का कहना है कि SIR प्रक्रिया अब केवल एक राज्य की समस्या नहीं रही, बल्कि यह एक राष्ट्रीय स्तर की लोकतांत्रिक खतरा बन चुकी है।
SIR के मसौदा मतदाता सूची के आंकड़े सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश में महिलाओं की संख्या में 21.4% की गंभीर गिरावट दर्ज की गई है, जिससे महिलाओं के पंजीकरण का लिंग अनुपात पहले 877 से घटकर 824 प्रति 1000 पुरुष दर्शाया गया है। यूपी में 1.54 करोड़ से अधिक महिला मतदाताओं के नाम कटे हैं, जो पुरुषों की तुलना में काफी अधिक है। इस गिरावट ने देशभर के अन्य राज्यों में समान लिंग‑अनुपात विषमता के संकेत भी बलवती किए हैं।
SDPI का कहना है कि महिला, दलित‑पिछड़े, मजदूर, गरीब और अल्पसंख्यक वर्गों के मतदाता SIR के तहत बाहर किए जा रहे हैं, जो किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए स्वीकार्य नहीं है। पार्टी ने यह मांग करते हुए कहा कि:
*शीघ्र लिंग‑आधारित और सामाजिक‑श्रेणी आधारित ऑडिट पूरा किया जाए
*राज्यवार हटाई गई मतदाताओं का खुलासा सार्वजनिक किया जाए
*गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल किए जाएँ
*ECI में संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित की जाए
SDPI ने नागरिक समाज संगठन, महिला समूह, पत्रकार, शिक्षाविद् और कानूनी विशेषज्ञों से अपील की है कि वे SIR की मतदाता सूचियों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण करें और राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता बहिष्कार के पैटर्न को उजागर करें। इसके अलावा पार्टी ने चेताया है कि चुनाव प्रक्रिया तभी सुरक्षित और न्यायसंगत हो सकती है जब सभी समुदायों और लिंगों के मतदाता सूची में समान रूप से उपस्थित हों।
चुनाव आयोग ने फिलहाल SIR की प्रक्रिया को मतदाता सूची की शुद्धि और डुप्लीकेट/मृत/स्थानांतरित नाम हटाने का आवश्यक कदम बताया है और कई राज्यों में मतदाता पुन: दावे एवं आपत्तियों की अवधि भी घोषित की है। वहीं विपक्षी दलों और नागरिक समूहों ने SIR के समय और तरीके पर कई सवाल उठाए हैं, जो आरोप लगाते हैं कि यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकती है।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR प्रक्रिया में “लॉजिकल विसंगतियों” वाले नामों को प्रकाशित करने का निर्देश दिया है, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
इन मुद्दों ने SIR को भारत में मतदाता अधिकारों एवं लोकतांत्रिक सहभागिता के सन्दर्भ में एक गरमाई हुई बहस का विषय बना दिया है, जिसे आगामी सप्ताहों में और तीव्रता मिलने की उम्मीद है।
