भारत को आज़ाद हुए 78 साल बीत चुके हैं, लेकिन समाज के हर वर्ग के लिए समानता और न्याय का सपना अभी भी अधूरा है। आज़ादी के बाद जो सबसे बड़ी वैचारिक धारा उभरी, वह थी सामाजिक न्याय की राजनीति। यह एक ऐसी राजनीति धारा है जो केवल सत्ता नहीं, समाज की संरचना बदलने का विजन रखती थी। इस धारा की सबसे मज़बूत जड़ें बिहार में थीं, जहाँ जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, और बाद में लालू प्रसाद यादव व नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने इसे दिशा दी।
लेकिन आज यही सामाजिक न्याय की राजनीति वैचारिक भ्रम, परिवारवाद और सत्ता की दौड़ में उलझी दिखाई देती है। सवाल यह है। क्या यह आंदोलन अब अपने रास्ते से भटक गया है?
स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ों के खिलाफ़ नहीं था, बल्कि समाज में फैली जातिगत और आर्थिक असमानताओं के खिलाफ़ भी एक संघर्ष था। कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं को लगा कि सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी काफी नहीं है, जब तक समाज में बराबरी नहीं आती। इसी सोच से 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना हुई।
आजादी के बाद, जब कांग्रेस सत्ता में आई, तो समाजवादी नेताओं को लगा कि कांग्रेस का रास्ता पूंजीवादी हो गया है। इसलिए उन्होंने सत्ता से दूरी बनाकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) जैसी अलग राजनीतिक धारा खड़ी की, जो आगे चलकर “सामाजिक न्याय” की राजनीति का आधार बनी।
सामाजिक न्याय की वैचारिक नींव डॉ. राममनोहर लोहिया ने रखी। उन्होंने जाति व्यवस्था को भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराई बताया। उनका कहना था कि “जब तक समाज में ऊँच-नीच रहेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।”
लोहिया ने ‘सप्त क्रांति’ (सात क्रांतियाँ) का नारा दिया, जाति, लिंग, रंग, आर्थिक विषमता, निजी संपत्ति, अन्यायपूर्ण युद्ध और जातिगत शोषण के खिलाफ़ संघर्ष।
उनका प्रसिद्ध नारा “पिछड़ा पावे सौ में साठ”। यह केवल आरक्षण की मांग नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक सत्ता में पिछड़ों की बराबर भागीदारी का आह्वान भी था। यही विचार आगे चलकर बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति की केंद्र बना।
1970 के दशक में जब देश में भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण से असंतोष फैला, तब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने “सम्पूर्ण क्रांति” का बिगुल बजाया। यह आंदोलन केवल सरकार गिराने के लिए नहीं था, बल्कि व्यवस्था को जड़ से बदलने की कोशिश थी।
जेपी के आंदोलन से ही बिहार में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेता उभरे। इस आंदोलन ने गरीबों, किसानों और पिछड़ों को यह अहसास कराया कि सत्ता पर उनका भी हक़ है।
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने और 1978 में उन्होंने ‘कर्पूरी फॉर्मूला’ लागू किया, जिससे पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ मिला। यह भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय का ऐतिहासिक मोड़ था।
1990 में वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिससे पिछड़े वर्गों को नौकरियों और शिक्षा में 27% आरक्षण मिला। इसी दौर में लालू प्रसाद यादव ने ‘गरीबों का हक, गरीबों का राज’ का नारा दिया। उन्होंने दलित-पिछड़ा-मुस्लिम (DMY) समीकरण बनाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को सत्ता तक पहुँचाया।
लालू यादव ने भाजपा के ‘कमंडल’ यानी हिंदुत्व एजेंडे का डटकर मुकाबला किया। आडवाणी की रथयात्रा को रोकना इसका बड़ा उदाहरण था। 1990 से 2005 तक बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति अपने चरम पर थी। पहली बार गाँव-गाँव में पिछड़े वर्गों की आवाज़ सत्ता तक पहुँची।
लेकिन यही दौर सामाजिक न्याय की राजनीति के पतन की शुरुआत भी बना। लोहिया और जेपी का उद्देश्य केवल जाति नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक समानता लाना था। लेकिन आगे चलकर यह राजनीति सिर्फ़ जातीय पहचान तक सीमित हो गई।
भूमि सुधार, शिक्षा, रोज़गार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पीछे छूट गए। सत्ता पाने और बचाने की राजनीति ने वैचारिकता को खत्म कर दिया।
लालू यादव का राज भ्रष्टाचार और ‘जंगल राज’ के आरोपों से घिर गया, जिससे इस धारा की नैतिक साख को नुकसान पहुँचा। वहीं, नीतीश कुमार ने “सुशासन” के नारे से खुद को अलग पहचान दी, पर भाजपा के साथ गठबंधन कर उन्होंने इस आंदोलन की वैचारिक शुद्धता पर सवाल खड़ा कर दिया।
मंडल आंदोलन ने पिछड़ों को सत्ता में भागीदारी दी, लेकिन इसका फायदा कुछ बड़ी जातियों तक सीमित रह गया। अतिपिछड़े (EBC) और महादलित वर्ग अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे। नीतीश कुमार ने इन्हें विशेष पहचान देकर लालू के मंडल आधार को तोड़ दिया।
भाजपा ने भी इस रणनीति को अपनाया और “सबका साथ, सबका विकास” जैसे नारों से सामाजिक न्याय की जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। नतीजतन, सामाजिक न्याय की राजनीति अब एकजुट आंदोलन नहीं, बल्कि कई छोटे-छोटे जातीय गुटों में बँट गई है।
सामाजिक न्याय केवल नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। इसे पुनर्जीवित करने के लिए समाजवादी दलों को कुछ बुनियादी कदम उठाने होंगे जैसे राजनीति को जाति तक सीमित न रखकर रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक समानता जैसे मुद्दों पर केंद्रित करना होगा।
परिवारवाद खत्म कर युवाओं और विचारशील कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा उनके हाथों में नेतृत्व देना होगा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सख्त रुख अपनाना होगा।
लोहिया के समय की तरह समाजवादी युवजन सभा जैसी संस्थाओं को पुनर्जीवित करना होगा। ताकि नई लोगों की वैचारिक प्रशिक्षण हो।
सामाजिक न्याय केवल भाषण में नहीं, नीतियों में दिखना चाहिए। चाहे वह शिक्षा, रोज़गार या प्रशासनिक सुधार हो या सरकार का चाल चरित्र।
सामाजिक न्याय की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र को गहराई दी है। इसने उन वर्गों को सत्ता और सम्मान दिया, जो सदियों तक वंचित रहे। लेकिन आज यह धारा सत्ता की राजनीति में फँसकर अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है।
अगर समाजवादी दल सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर जनता के असली मुद्दों रोज़गार, शिक्षा, सम्मान और समान अवसर पर लौट आएँ, तो सामाजिक न्याय का विचार फिर से जीवंत हो सकता है।
यह केवल एक राजनीतिक दिशा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को बचाने की लड़ाई है।
