सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुस्लिम समाज के तलाक‑ए‑हसन की उस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए, जिसमें पुरुष अपने वकील के माध्यम से पत्नी को तलाक का नोटिस भेज देते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर तलाकनामे पर पति के हस्ताक्षर नहीं हैं, तो इसे वैध विवाह विच्छेद दस्तावेज नहीं माना जा सकता।
मामला टीवी पत्रकार बेनजीर हीना द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने अदालत में बताया कि उनके पति, जो खुद वकील हैं, ने किसी अन्य वकील के माध्यम से उन्हें तलाक का नोटिस भेजा और इसके बाद दूसरी शादी कर ली। वरिष्ठ अधिवक्ता रिजवान अहमद ने कहा कि बिना हस्ताक्षर वाले तलाकनामे के कारण महिलाओं को भविष्य में विवाह और वैवाहिक सुरक्षा में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
तीन-न्यायाधीशीय पीठ — जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस यू. भुयान और जस्टिस एन. के. सिंह — ने इस प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने पूछा, “एक तीसरा पक्ष पति की ओर से पत्नी को तलाक का नोटिस कैसे भेज सकता है? तलाकनामे पर पति के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।” कोर्ट ने कहा कि यह तरीका महिलाओं की गरिमा को नुकसान पहुंचा सकता है और इस तरह की प्रथाओं को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वे शरिया कानून की पूरी प्रक्रिया का पालन करें और महिला को वैध तलाक दें। पीठ ने महिला की सुरक्षा, उनके बच्चों की भलाई और शिक्षा के लिए उचित कदम उठाने का भरोसा भी दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि तलाक‑ए‑हसन की प्रक्रिया सिर्फ उच्च-शिक्षित महिलाओं तक सीमित नहीं है। ग्रामीण और निरक्षर महिलाओं की स्थिति पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत ने यह मामला तलाक‑ए‑हसन की वैधता पर विस्तृत सुनवाई के लिए आगे बढ़ाने और संभवतः पांच-न्यायाधीशीय संविधान पीठ में विचार करने का संकेत दिया।
अगली सुनवाई में पति को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग से भी राय मांगी है।
