देश के चर्चित भीमा कोरेगांव मामला में जेल में बंद जनपक्षीय वकील सुरेंद्र गाडलिंग की रिहाई की मांग को लेकर गुरुवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक सार्वजनिक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का आयोजन Campaign Against State Repression (CASR) ने किया, जिसमें वकीलों, पत्रकारों और शिक्षाविदों ने भाग लिया। वक्ताओं ने इस मामले को लोकतांत्रिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं और न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।
बैठक में बोलते हुए अधिवक्ता जगदीश मेश्राम ने कहा कि सुरेंद्र गाडलिंग लंबे समय से आदिवासी और हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते रहे हैं। उन्होंने कहा कि गाडलिंग उन लोगों के लिए खड़े होते थे जिन्हें अक्सर कानूनी प्रतिनिधित्व तक भी पहुंच नहीं मिलती। मेश्राम ने यह भी कहा कि अपने काम के कारण गाडलिंग को पुलिस और राज्य तंत्र की ओर से लगातार धमकियों का सामना करना पड़ता था।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सख्त कानूनों का इस्तेमाल बढ़ते हुए तरीके से कार्यकर्ताओं, वकीलों और बुद्धिजीवियों के खिलाफ किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है और नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि कठोर कानूनी प्रावधानों के तहत लोगों की लंबी कैद कानून के शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कानूनी शोधार्थी गौतम भाटिया ने गाडलिंग और प्रोफेसर हनी बाबू द्वारा लिखे गए एक लेख का जिक्र करते हुए गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत से जुड़े कानूनी पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस कानून में “कोर्ट” की परिभाषा इस तरह दी गई है कि जमानत के समय पुलिस के आरोपों का प्रारंभिक मूल्यांकन मुख्य रूप से सत्र न्यायालय तक सीमित हो जाता है, जिससे उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की समीक्षा की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
उन्होंने धारा 43D(5) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें प्रयुक्त “reasonable” शब्द का अर्थ यह है कि अदालतों को केवल आरोपों को सतही तौर पर स्वीकार करने के बजाय उनका गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए।
खोजी पत्रकार सौरव दास ने न्यायपालिका के कामकाज पर चिंता जताते हुए कहा कि विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय का स्वरूप धीरे-धीरे “मैनेजरियल कोर्ट” की तरह दिखाई देने लगा है, जो कई मामलों में राज्य के साथ तालमेल में काम करता प्रतीत होता है। उन्होंने न्यायिक व्यवस्था में “फिक्सरों” की बढ़ती भूमिका पर भी सवाल उठाए और इसे न्याय प्रणाली की पारदर्शिता के लिए खतरा बताया।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि न्यायपालिका को व्यवस्था का “ब्रेक” बनकर काम करना चाहिए, न कि “एक्सेलेरेटर” की तरह। उनका कहना था कि अदालतों की भूमिका राज्य सत्ता की अति को नियंत्रित करने की होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब इतिहास लिखा जाएगा तो न्यायपालिका के सदस्यों को जनता के सामने जवाबदेही और गरिमा के साथ खड़ा होने में सक्षम होना चाहिए।
दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की पूर्व अध्यक्ष नंदिता नारायण ने संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए जन-एकजुटता की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षकों, छात्रों और लोकतांत्रिक संगठनों से अपील की कि वे कठोर कानूनों के तहत जेल में बंद वकीलों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की रिहाई के लिए आवाज उठाएं।
बैठक के अंत में सभी वक्ताओं ने सामूहिक रूप से सुरेंद्र गाडलिंग की तत्काल रिहाई की मांग की और नागरिकों, सिविल सोसायटी संगठनों तथा लोकतांत्रिक ताकतों से राज्य दमन के खिलाफ एकजुट होकर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान किया।