“ग्रामीण क्षेत्रों में महिला शिक्षा” के विषय पर इंसाफ़ टाइम्स ने अयोजित किया पैनल डिस्कस, अतिथियों ने विस्तार से चर्चा करते हुए महिलाओं को दिया पैग़ाम

पटना (उज़मा सदफ/इंसाफ़ टाईम्स) “ग्रामीण क्षेत्रों में महिला शिक्षा” विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। ये चर्चा इंसाफ टाइम्स (उर्दू, हिंदी न्यूज पोर्टल और ई-पेपर) इंसाफ टाइम्स के यूट्यूब और फेसबुक पेज पर शनिवार को हुआ। पैनल चर्चा की मेजबानी स्वतंत्र पत्रकार सदफ खान ने की। जेंडर विशेषज्ञ, डॉ. अपर्णा दीक्षित और एसोसिएट प्रोफेसर, फिरदौस अजमत सिद्दीकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और अवसरों पर अपने विचार साझा किए। डॉ. अपर्णा दीक्षित ने कहा, “अभी भी एक रूढ़िवादी स्थिति है। हालांकि, समय के साथ लोगों की मानसिकता बदल गई है। और वे अधिक जागरूक हो गए हैं, ज्यादातर लोग कहते हैं कि हमने अपनी बेटी को बेटे की तरह पाला है। हमारी बेटी मेरे लिए एक बेटे की तरह है। लेकिन समाज अभी भी दो वर्गों में बंटा हुआ है। एक वह है जो महिला शिक्षा की सराहना करता है और उसका समर्थन करता है। दूसरा वह है जो मानता है कि अगर एक महिला शिक्षित हो गई तो पूरा परिवार नष्ट हो जाएगा। एक उन लोगों का वर्ग है, जो महिलाओं से परिवार की गरिमा, जाति की शुद्धता और लैंगिक मानदंडों को बनाए रखने की उम्मीद करता है।”

दीक्षित ने आगे एक सुंदर कविता “मेरे गाँव की लड़की शहर पढ़ने आई है” का पाठ किया, जिसमें दर्शाया गया है कि कैसे महिलाएं पितृसत्तात्मक सोच को ध्वस्त कर रही हैं।

आगे सदफ ने सवाल पूछा कि शिक्षा के मामले में मुस्लिम महिलाओं को हाशिए पर क्यों रखा जाता है? मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए मदरसों और स्कूलों को प्राथमिकता क्यों दी जाती है?

इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर अजमत सिद्दीकी ने असहमति जताई। उन्होंने कहा, “यह सच है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं हाशिए पर हैं। उन्हें अन्य धर्मों की तुलना में शिक्षा के बारे में कम जानकारी है। लेकिन इसे मापने का सही तरीका धर्म नहीं बल्कि जाति और क्षेत्र होने चाहिए। क्योंकि मुख्य धारा का महिला आंदोलन मुख्य रूप से उच्च जाति की महिलाओं के मुद्दों के लिए था। और निचली जाति की महिलाओं के मुद्दों को अक्सर हाशिए पर रखा गया है। उनके अनुसार अधिकांश अशिक्षित महिलाएं विभिन्न धर्मों की निचली जातियों से संबंधित हैं। दलित महिलाओं और अन्य सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों की महिलाओं के साथ-साथ निम्न जाति की मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी शिक्षा प्राप्त करने में बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने आगे कहा कि हमें उनके असल मुद्दों को जानने की जरूरत है। इस बात पर ज़ोर दिया कि असली मुद्दे उनकी रोजी-रोटी, शिक्षा और रोजगार हैं। न कि वैसे मुद्दे जो आज राजनीतिक लाभ के लिए चर्चा में होते है। चर्चा के अंत में दोनों वक्ताओं ने उन लड़कियों को सलाह दी जो पढ़ना चाहती हैं। और पढ़ नहीं पा रही हैं।

प्रो. अजमत सिद्दीकी ने कहा, ”जहाँ चाह, वहाँ राह” अगर कोई लड़की पढ़ना चाहती है तो उसे कोई नहीं रोक सकता। वह अपना रास्ता खुद बनाने में सक्षम है।

डॉ. अपर्णा ने कहा, “वंचित अपनी समस्याओं को बेहतर तरीके से जानते हैं। वे बेहतर जानते हैं कि इसे कैसे हल करना है।

आखिर में यह पूछे जाने पर कि क्या इस्लाम में लड़कियों की शिक्षा प्रतिबंधित है? प्रो. अजमत ने कहा कि यह सच नहीं है। इस्लाम में हर मर्द और औरत के लिए तालीम हासिल करना अनिवार्य है।

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