
एमडी स्वालेह अंसारीइलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद अक्सर लोग ये सवाल पूछ लेते है कि आखिर ये मुस्लिम लड़कियां नकाब क्यों पहनती है, नकाब के नाम पर इनको दबा के क्यों रखा जाता है, नकाब इनको पढ़ने से रोकता है, नकाब को वजह से ये बाहर कम निकलती है वगैरह वगैरह के सवाल होते ही रहते है। कभी किसी नेता का मन किया तो वो बयान दे देता है कि नकाब को बैन कर देना चाहिए, कभी किसी का मन करता है तो सोशल मीडिया पर ही सवाल उठा दिया जाता है कि तुम नकाब क्यों पहनते हो। बात अभी कुछ महीनों पहले की है जब ए आर रहमान की बेटी खदीजा को लेकर किसी ने सवाल खड़ा किया की नकाब क्यों पहनती हो। जिसके बाद खदीजा ने उनको जवाब दिया और उनके साथ ही उनके फैंस ने भी उन्हें खरी खोटी सुनाई। खदीजा से ने तो सीधा कहा हम जिस मुल्क में रहते है वहा हर किसी को पहनने खाने ओढ़ने कि आज़ादी है जो चाहे पहने जो चाहे खाए आप कौन होते हो सवाल करने वाले। इसी तरह नोबल इनाम याफ्ता यमनी लड़की से जब सवाल किया मीडिया ने, कि मैम आप तो पढ़ी लिखी और बहुत समझदार हो फिर भी आप नकाब क्यों पहनती हो, तो उनका सीधा सा जवाब था कि साइंस भी इस बात को तस्लीम करता है कि जब मानव समाज सभ्य हुआ और जैसे जैसे बौद्धिक विकास करता गया पहले उसने पत्तो पेड़ की छालों से अपने जिस्म को ढका और जब बिल्कुल सभ्य हुआ तो उसने कपड़े के आविष्कार के बाद उसको पहनना शुरू किया यानी अपने जिस्म को ढकना छिपाना एक सभ्य समाज की पहचान है इस लिए हम अपने जिस्म को ढांकते है उसे छिपाते है। ऐसे कई मामले आपको मिल जाएंगे जैसे जब ब्रिटेन में महिलाओ के नकाब पर पाबन्दी लगाई गई और पहनने पर जुर्माने की बात कही गई, तो वहां के एक बड़े बिजनेसमैन ने ये ऐलान कर दिया कि “मुस्लिम महिलाए बिना किसी डर के नकाब पहने उनका जुर्माना मै खुद दूंगा” और आज भी वो जुर्माने देता है। इस तरह एक तरफ हम देखते है की जहा नकाब को पहनने को लेकर कई सवाल है और उनके जवाब भी है वहीं दूसरी तरफ न जानने और समझने की वजह से अक्सर लड़कियां मां बाप भाई या किसी और के डर से नकाब पहनती हैं। जब उनसे सवाल किया जाता है को आप नकाब क्यों पहनती है तो जवाब कुछ भी हो उनके मन में एक डर होता है जो उनके अपने मां बाप भाई या बड़ी बहन का होता है जिनके जरिए ये बात बार बार उनके जहन में बिठाई जाती है कि बाहर जाना तो नकाब पहन लेना नहीं तो अम्मी बोलेंगी, नहीं तो भाई बोलेगा, नहीं तो अब्बू की डांट पड़ेगी, मुहल्ले के लोग क्या कहेंगे।अक्सर घरों ने माए नकाब पहनती है जब नई नई शादी हो कर आती है, लेकिन जैसे जैसे दिन गुजरते है रात ढलती है जिंदगी कि शाम आती है और घरों में बेटियां जवान होने लगती है तो मां के चेहरे से नकाब उतरने लगता है और मां की ख्वाहिश होती है कि बेटी जब भी बाहर निकले उस के चेहरे पर नकाब हो जबकि मां खुद बिना नकाब के बेटी के साथ होती है। जरा सोचो जो लड़की बचपन से मां को पर्दा करते हुए देखती चली अाई है जो बचपन से ये देखती हो कि घर से बाहर निकलने से पहले मां निकाब पहनती थी और जब जब बेटी जवान हो रही पर्दे कि अहमियत और जिंदगी में बढ़ रही तब मां के चेहरे से नकाब का हटना उसे भी कहीं न कहीं सोचने पर मजबूर कर देती है उसे इस बात को सोचने पर मजबूर कर देती है कि अब मैं भी अगर नकाब न पहनूं तो कोई हर्ज नहीं होगा। जबकि जवानी का यही वक्त होता है कि एक लड़की और ज्यादा कसरत से पर्दा करे अपने जिस्म को छिपाए अपनी शर्मगहो की हिफाज़त करे ताकि गली कूचों चौराहों और सड़को पर चलने वाली हवस कि निगाहों से खुद को बचाए, खुद को बचाए उन दरिंदो से जो दरिंदो से भी बदतर होते है, खुद को बचाए उन राक्षसों से को राक्षसों से भी बुरे होते है। एक जानवर किसी को अपना शिकार इस लिए बनाता है ताकि वो अपनी भूख को मिटा सके लेकिन आदमी जब किसी लड़की को चाहे वो पांच साल की बिटिया हो या पैसठ साल की मां, जब उसका शिकार बनाता है तो सिर्फ भूख नहीं मिटाता है बल्कि उस लड़की की, उस मां की उस बेटी की जिंदगी को मिटा देता है उसको इससे भी चैन नहीं मिलता वो इसके जिस्मो को चीर देता है, उससे भी उसका पेट नहीं भरता तो उसकी कमर को तोड़ दिया है, उसके हाथो उसके पैरो को काट देता है उसके चेहरे पर तेजाब डाल कर जला देता है और जब उसका मन उससे भी नहीं भरता तो उसकी जिस्म के अंदर राड सरिया और पता नहीं क्या क्या डाल देता है। और फिर उस लड़की का एक एक खून जमीन पर टपकता है और चीखता है कि मुझे इं हैवानों के शहेर में अब मत भेजना मुझे बेटी मत बनाना मुझे इंसानों से नफरत है घिन आती है ये इंसान सड़े हुए इंसान है। नकाब को इसी लिए एक लड़की पहनती है ताकि अपनी अस्मत की हिफाज़त कर सके, ताकि अपने जिस्म को लूटने से बचा सके, उसे हवस का शिकार होने से बचा सके, उसकी अपनी इज्जत को तार तार होने से बचा सके और साथ ही अपने आप को एक सभ्य समाज होने कि पहचान बता सके।