
बिहार की राजनीति में इन दिनों बांकीपुर उप-चुनाव की चर्चा जोर पकड़ रही है, वजह हैं प्रशांत किशोर। बांकीपुर पटना की वह शहरी विधानसभा सीट है जिसपर भाजपा का 30 सालों से अधिक समय से कब्जा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन इस सीट से 2006 से लगातार विधायक थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद वे अप्रैल 2026 में राज्यसभा चले गए हैं। इसलिए उन्होंने बांकीपुर सीट से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफा देने के 6 महीने के भीतर यहां उप-चुनाव होना तय है। इस 6 महीने में 2 महीने से अधिक का समय बीत चुका है। यानी अगले 3-4 महीने में यहां उप-चुनाव होना निश्चित है।
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की बांकीपुर सीट से उप-चुनाव लड़ने की चर्चा चल रही है। ये चर्चा उनके और जन सुराज के नेताओं के बयान पर ही आधारित है। मतलब साफ है कि जन सुराज के भीतर प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने को लेकर मंथन चल रहा है। वे लड़ेंगे या नहीं इसकी औपचारिक घोषणा होने तक ये चर्चा चलती रहेगी। पीके ने जन सुराज की शुरुआत साल 2022 में एक अभियान के तौर पर की थी। 2 अक्टूबर 2024 को इस अभियान को राजनीतिक दल में परिवर्तित किया और 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ा। जन सुराज को पिछले विधानसभा चुनाव लगभग साढ़े 3 प्रतिशत वोट मिला और एक भी सीट हासिल नहीं हुई। चुनाव के बाद से जन सुराज और प्रशांत किशोर की राजनीति को फिर से खड़ा होने के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत है। शायद बांकीपुर वो ऑक्सीजन पार्टी को दे सकती है। अब बात करते हैं कि अगर प्रशांत किशोर यहां से चुनाव लड़ते हैं तो क्या परिस्थितियां बन सकती हैं।
अगर प्रशांत किशोर खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो निश्चित तौर पर जन सुराज के नेताओं और कार्यकर्ताओं में अधिक उत्साह होगा जो विधानसभा चुनाव की हार से उबरने में मदद करेगा। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अपनी पूरी ताकत झोंक कर पीके को विधानसभा पहुंचाने के लिए मेहनत करेंगे। अगर पीके चुनाव जीत जाते हैं तो जन सुराज को अगले चुनाव तक टिके रहने और राजनीति करने के लिए एक मजबूत ठिकाना मिल जाएगा। पीके विधायक बनते हैं तो उसके बाद विपक्ष की एक मुखर आवाज बन जाएंगे, उनके अंदर ये क्षमता है। इससे उन्हें पार्टी को मजबूत करने में बहुत मदद मिलेगी। पीके नैरेटिव सेट करने में माहिर हैं, वे इस एक जीत को अच्छे से भुनाकर अपने लिए बिहार की राजनीति में अच्छी जगह बना लेंगे और 2030 की लड़ाई बिहार में त्रिकोणीय और दिलचस्प हो जाएगी।
लेकिन, अगर पीके बांकीपुर से चुनाव लड़कर हारते हैं तो विपक्ष उनको सिरे से खारिज करने की कोशिश करेगा। उनकी राजनीति को समाप्त बताएगा। लेकिन क्या कोई बड़ा नेता चुनाव हारा नहीं? देश के लगभग बड़े नेता कभी न कभी चुनाव हारे हैं। चुनाव हारने से किसी की राजनीति खत्म नहीं होती और कोई कमजोर नहीं होता। चुनाव नहीं लड़ने से नेता कमजोर होता है। नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन का पहला दो विधानसभा हार कर तीसरी बार में सदन पहुंचे थे। अटल बिहार वाजपेयी से लेकर राम मनोहर लोहिया तक चुनाव हारते रहे हैं। लालू यादव इसी पटना की पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव हार चुके हैं। राबड़ी देवी अपने गढ़ राघोपुर से चुनाव हार चुकी हैं। पीके के पास इस वक्त खोने के लिए कुछ भी नहीं है। अगर वे चुनाव लड़कर हारते भी हैं तो उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं में संतोष होगा कि उनका नेता लड़ता है। विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के कारण उनके कई कार्यकर्ताओं को निराशा हुई थी और कई विश्लेषक ये मानते हैं कि अगर पीके खुद चुनाव लड़ते तो कम से कम उनकी पार्टी का वोट शेयर बढ़ जाता। राघोपुर से वे जीतते या नहीं इसका नहीं पता, लेकिन वे किसी दूसरी सीट से लड़ते तो उन्हें विधानसभा पहुंचाने में अधिक दिक्कत नहीं होती।
एक चर्चा ये भी चल रही है कि वे विपक्ष के साझा उम्मीदवार हो सकते हैं। महागठबंधन नितिन नवीन की सीट को हराने के लिए प्रशांत किशोर का समर्थन कर देगी और वहां कोई उम्मीदवार नहीं देगी। इसकी संभावना कम दिखाई देती है, तेजस्वी कभी नहीं चाहेंगे कि पीके चुनाव जीत का विधानसभा पहुंच जाएं। क्योंकि वे जानते हैं कि इस एक कदम से पीके नेता बन जाएंगे और उनकी विपक्ष के नेता के तौर पर कुर्सी खतरे में आ जाएगी। महागठबंधन यही चाहेगा कि बिहार की लड़ाई NDA और उनके बीच ही रहे, कोई तीसरा इसमें हिस्सेदार न बने।
बांकीपुर से पीके के चुनाव लड़ने या न लड़ने का निर्णय स्वयं प्रशांत किशोर और जन सुराज को लेना है। लेकिन इतना तय है कि अगर वे चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर देंगे। हारेंगे या जीतेंगे ये बांकीपुर की जनता को तय करना है। लेकिन नतीजे चाहे कुछ भी हों पीके और जन सुराज के लिए इसमें राजनीतिक नुकसान से अधिक राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना अधिक दिखाई पड़ती है।