पत्रकार हिलाल मीर और रिज़ाज सिद्दीकी की गिरफ़्तारी पर उठे सवाल!CASR के तहत छात्र संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने की कड़ी निंदा, प्रेस स्वतंत्रता पर बताया हमला

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

भारत में पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जाने-माने कश्मीरी पत्रकार हिलाल मीर और केरल के स्वतंत्र पत्रकार रिज़ाज एम. सिद्दीकी की गिरफ़्तारी पर देशभर के छात्र संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ‘कैम्पेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन’ (CASR) ने इस कार्रवाई को प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है।

क्या है मामला?

रिज़ाज सिद्दीकी को दिल्ली में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर CASR द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के बाद वापस केरल लौटते वक्त नागपुर पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस ने आरोप लगाया है कि रिज़ाज सोशल मीडिया पोस्ट और कुछ किताबों व पर्चों के ज़रिए सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की मानसिकता रखता है। गिरफ़्तारी का आधार बनी सामग्री में GN साईंबाबा की जीवनी, ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए एक 7 साल के बच्चे की तस्वीर और एक पुराना पर्चा शामिल है जिसमें CPI (माओवादी) और भारत सरकार के बीच शांति वार्ता की बात की गई थी।

इसी तरह कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार हिलाल मीर को भी गिरफ़्तार किया गया। मीर पर सोशल मीडिया पर घरों की तोड़फोड़ और सैन्य हिंसा की तस्वीरें साझा करने का आरोप है। पुलिस का कहना है कि मीर का उद्देश्य असंतोष फैलाना और अलगाववादी विचारों को बढ़ावा देना था।

CASR और सहयोगी संगठनों की प्रतिक्रिया

CASR और इससे जुड़े छात्र व मानवाधिकार संगठन जैसे कि AISA, AISF, ASA, Bhim Army, CRPP, Fraternity, Rihai Manch, SFI, WSS और कई अन्य ने एकजुट होकर इन गिरफ़्तारियों की निंदा की है। उनका कहना है कि ये घटनाएं साबित करती हैं कि भारत में अब सच्चाई दिखाने वाले पत्रकारों को अपराधी घोषित किया जा रहा है।

CASR ने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा खुद को माओवादी संगठन का मुखौटा बताने के आरोप को भी झूठा और मानहानिकारक बताया है। बयान में यह भी कहा गया है कि “पत्रकारिता अपराध नहीं है” और सरकार को पत्रकारों की तत्काल रिहाई करनी चाहिए।

संविधान और लोकतंत्र पर चोट
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सरकार का यह रवैया संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मूल मूल्यों के विरुद्ध है। अगर सरकार विरोध में उठने वाली आवाज़ों को इस तरह दबाएगी, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा होगा।

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