UGC के इक्विटी नियमों पर विरोध तेज, PCS अधिकारी का इस्तीफ़ा!BJP के स्वर्ण कार्यकर्ताओं की नाराज़गी, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध तेज़ हो गया है। सवर्ण हिंदू छात्रों और उनके अभिभावकों का आरोप है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं और उन्हें संभावित उत्पीड़क के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इसी मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश के बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंक अग्निहोत्री, 2019 बैच के प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी, ने सोमवार (26 जनवरी 2026) को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में UGC के इक्विटी नियमों से असहमति जताई है।

इस बीच लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लगभग एक दर्जन स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफ़ा सौंप दिया। उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व छात्रों और अभिभावकों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है।

UGC के नए नियमों के तहत देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है। इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। ये नियम वर्ष 2012 में लागू एंटी-डिस्क्रिमिनेशन रेगुलेशंस की जगह लाए गए हैं।

उत्तर प्रदेश से BJP के विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने UGC को पत्र लिखकर कहा है कि इन नियमों के कारण जनरल कैटेगरी के छात्र असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

वहीं, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ता मृत्युंजय तिवारी ने इन नियमों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाख़िल की है। याचिका में नियमों को संविधान के समानता के अधिकार के विरुद्ध बताया गया है।

दूसरी ओर, झारखंड से BJP सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर कहा कि नए नियमों को लेकर फैली “सभी गलतफहमियों” को जल्द दूर किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लागू किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते सवर्ण छात्रों के हितों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।

UGC के इक्विटी नियमों को लेकर जारी यह विवाद अब प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक स्तर पर पहुंच चुका है। आगे की स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और केंद्र सरकार के रुख पर निर्भर करेगी!

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