उर्दू भाषा पर हमला:मुज़फ्फरपुर के स्कूल की तख्ती पर स्याही पोते जाने की घटना की CPI (एम-एल) ने की कड़ी निंदा, कार्रवाई की मांग

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

मुज़फ्फरपुर ज़िले के औराई प्रखंड के राजखंड उत्तर पंचायत अंतर्गत बसंतपुर स्थित राज्य मध्य विद्यालय की उर्दू तख्ती पर शरारती तत्वों द्वारा स्याही पोतकर नाम को मिटाने की घिनौनी कोशिश की गई। इस निंदनीय हरकत पर CPI (एम-एल) के औराई-कटरा संयोजक मनोज कुमार यादव और महागठबंधन समर्थित CPI (एम-एल) के पूर्व उम्मीदवार आफ़ताब आलम ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे न केवल एक भाषा पर हमला बताया, बल्कि इसे संविधान प्रदत्त भाषाई अधिकारों के खिलाफ आपराधिक और सांप्रदायिक मानसिकता का प्रतीक भी कहा।

मनोज कुमार यादव ने कहा कि स्कूल की उर्दू तख्ती को निशाना बनाना न सिर्फ भाषाई भेदभाव का उदाहरण है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी सांप्रदायिक साज़िश भी काम कर रही है, जिसका मकसद सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना और धार्मिक नफरत फैलाना है। उन्होंने प्रशासन से माँग की कि इस मामले को गंभीरता से लेकर दोषियों की पहचान की जाए और उनके ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने शीघ्र कार्रवाई नहीं की तो लोकतांत्रिक तरीक़े से एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा।

आफ़ताब आलम ने इस मौके पर 15 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा उर्दू भाषा के संबंध में दिए गए ऐतिहासिक फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए कहा कि उर्दू के प्रति पूर्वाग्रह इस ग़लतफ़हमी का परिणाम है कि यह कोई विदेशी भाषा है, जबकि असलियत यह है कि उर्दू भारत में ही जन्मी और पली-बढ़ी भाषा है, जो विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों वाले लोगों के आपसी संवाद का माध्यम बनी।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस बयान का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि “भाषा किसी धर्म की नहीं होती, वह किसी समुदाय, क्षेत्र या क़ौम की होती है। उर्दू गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक शानदार मिसाल है।” आफ़ताब ने आगे कहा कि उर्दू और हिंदी का रिश्ता गहरा है और यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उर्दू शब्दों के बिना हिंदी में दैनिक बातचीत असंभव है।

CPI (एम-एल) नेताओं ने यह भी माँग की कि स्कूल की इमारत पर उर्दू में नाम दोबारा लिखा जाए ताकि भाषाई सम्मान की पुनर्स्थापना हो सके और शरारती तत्वों को यह स्पष्ट संदेश दिया जा सके कि संविधान और जन एकता से बड़ा कुछ नहीं।

यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब देश को एकता, सहिष्णुता और संवैधानिक मूल्यों की सबसे अधिक आवश्यकता है। ऐसे में भाषा, पहचान और संस्कृति पर होने वाले हमले न केवल निंदनीय हैं बल्कि गंभीर चिंता का विषय भी हैं।

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