उत्तराखंड के स्कूलों में गीता-रामायण की पढ़ाई शुरू, शिक्षक संघों ने उठाए संविधानिक सवाल

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

उत्तराखंड सरकार ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर बुधवार से श्रीमद् भगवद् गीता और रामायण को राज्य के सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया है। सरकार का दावा है कि यह कदम छात्रों में नैतिक मूल्यों और जीवन-दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से उठाया गया है। लेकिन इस फैसले को लेकर प्रदेशभर में शिक्षक संगठनों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया है।

शिक्षक संघों का कहना है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 28(1) का उल्लंघन है, जो राज्य द्वारा वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगाता है।

उत्तराखंड शिक्षक संघ के अध्यक्ष संजय कुमार तम्टा ने कहा कि गीता और रामायण धार्मिक ग्रंथ हैं और इन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़ाना संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा के खिलाफ है। “अनुच्छेद 28(1) स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी पूर्णतः राज्य वित्तपोषित संस्थान धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकता। यह फैसला एक धर्म को बढ़ावा देने वाला है और इससे अन्य धर्मों के छात्र असहज महसूस करेंगे”

राज्य के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने इस विरोध को निराधार बताते हुए कहा कि यह धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की शिक्षा है।“हम गीता और रामायण को पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि प्रार्थना सभा के दौरान नैतिक शिक्षा के हिस्से के रूप में शामिल कर रहे हैं। बच्चों को सप्ताह में एक श्लोक और उसका अर्थ समझाया जाएगा।”

राज्य शिक्षा विभाग के अनुसार, ‘श्लोक ऑफ द वीक’ कार्यक्रम के तहत गीता के श्लोकों और रामायण के प्रसंगों को नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाएगा और शिक्षकों द्वारा उसका व्यावहारिक अर्थ समझाया जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 28(1) में साफ कहा गया है कि कोई भी धार्मिक शिक्षण सरकारी स्कूलों में नहीं दिया जा सकता। कई शिक्षाविदों ने आशंका जताई है कि एक विशेष धर्म के ग्रंथ को अनिवार्य बनाना भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए ख़तरनाक संकेत है।

प्रोफेसर अलका जोशी, शिक्षा विशेषज्ञ मीडिया से कहती हैं “अगर सरकार गीता और रामायण को संस्कृति के नाम पर शिक्षा में शामिल करती है, तो इसे लेकर अन्य धर्मों के लोग भी अपने धार्मिक ग्रंथों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग करेंगे। इससे शिक्षा तटस्थ नहीं रह पाएगी।”

शिक्षक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने यह निर्णय वापस नहीं लिया, तो वे न्यायालय का रुख करेंगे। इसके साथ ही प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन अभियान शुरू करने की योजना बनाई जा रही है।

उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय जहां एक ओर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस विवाद का समाधान संवाद से करती है या न्यायालय इसका फैसला करेगा।

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