इंसाफ़ टाइम्स डेस्क
17 सितम्बर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में जन्मे ई.वी. रामास्वामी नायकर, जिन्हें दुनिया “पेरियार” के नाम से जानती है, ने भारतीय समाज को गहराई से हिला दिया। पेरियार का मतलब ही है—महान इंसान। और वे महान इसलिए बने क्योंकि उन्होंने समाज की उस बुनियाद को चुनौती दी, जिसे लोग सदियों से “परंपरा” और “धर्म” के नाम पर unquestioned मानते आए थे।
पेरियार की पृष्ठभूमि
धनी व्यापारी परिवार में जन्मे पेरियार आराम और प्रतिष्ठा से भरा जीवन जी सकते थे। कम उम्र में ही उनकी शादी नागम्मल से हो गई और व्यापार में भी वे सफल रहे। लेकिन सामाजिक अनुभवों ने उन्हें बेचैन किया। जातिवाद, ऊँच-नीच और महिलाओं पर पाबंदियों ने उन्हें झकझोर दिया।
वाराणसी की यात्रा उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बनी। वहाँ उन्होंने देखा कि किस तरह मंदिरों और धर्मस्थलों में ऊँची जातियों का वर्चस्व है और दलितों-निचली जातियों के साथ अमानवीय भेदभाव किया जाता है। यह अन्याय उनकी आत्मा को झकझोर गया और उन्होंने तय कर लिया कि इस व्यवस्था को बदलना ही होगा।
Self-Respect Movement: बराबरी की क्रांति
1925 में पेरियार ने Self-Respect Movement की शुरुआत की। इस आंदोलन का मकसद साफ़ था—हर इंसान बराबर है, चाहे वह ब्राह्मण हो या दलित, पुरुष हो या महिला।
इस आंदोलन ने हिंदू धर्म की जाति-आधारित परंपराओं, ऊँच-नीच की मानसिकता और अंधविश्वासों पर सीधा वार किया।
उन्होंने कहा— “अगर कोई किताब इंसान को नीचा दिखाती है तो वह किताब जलाने लायक है।”
यही वजह थी कि उन्होंने रामायण को जातिवादी बताया और सार्वजनिक रूप से उसका विरोध किया।
महिलाओं के अधिकार और Self-Respect Marriage
पेरियार ने महिलाओं की स्थिति को लेकर सख़्त रुख अपनाया। उन्होंने पर्दा, दहेज और जबरन विवाह का विरोध किया।
उन्होंने Self-Respect Marriage की शुरुआत की—जहाँ न कोई पंडित होगा, न मंत्र, न दहेज। बस दो लोग और उनका आपसी निर्णय। यह विवाह व्यवस्था आज भी तमिलनाडु की सामाजिक-सांस्कृतिक ज़िंदगी का अहम हिस्सा है।
जातिवाद और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ़ लड़ाई
पेरियार ने मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया ताकि दलित और पिछड़े वर्ग भी मंदिरों में जा सकें। उनका सवाल था—
“भगवान किसका है? सिर्फ़ ब्राह्मण का?”
उन्होंने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि ईश्वर और धर्म के नाम पर बनाए गए नियम असल में बराबरी को खत्म करने का हथियार हैं।
राजनीतिक विरासत
पेरियार की सोच से निकला द्रविड़ आंदोलन ही आगे चलकर DMK और AIADMK जैसी राजनीतिक पार्टियों का आधार बना।
तमिलनाडु की राजनीति आज भी पेरियार के बिना अधूरी मानी जाती है।
जब केंद्र सरकार ने हिंदी को थोपने की कोशिश की तो पेरियार सड़कों पर उतरे और कहा “भाषा भी आत्मसम्मान है।”
यही आंदोलन आगे चलकर तमिल पहचान की रीढ़ बना।
शिक्षा और वैज्ञानिक सोच
पेरियार ने शिक्षा पर विशेष जोर दिया। उनका मानना था—
“शिक्षा लो, बिना शिक्षा इंसान हमेशा दबा रहेगा।”
उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कशीलता को जीवन का आधार बनाया।
वे कहते थे “शनिवार को बाल मत कटवाओ, वरना शनि देव नाराज़ हो जाएंगे।”
देवता का कोई नाई है क्या?”
यानी हर बात को तर्क और लॉजिक की कसौटी पर परखो।
आज पेरियार होना क्या है?
पेरियार को केवल मूर्तियों, किताबों या राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
पेरियार होना मतलब—
हर अन्याय और भेदभाव के खिलाफ़ सवाल उठाना।
बराबरी पर अडिग रहना।
झूठी परंपराओं से समझौता न करना।
आज भी
दलित दूल्हे की बारात पर विवाद होता है।
अंतरजातीय शादी पर ऑनर किलिंग होती है।
महिलाओं को बराबरी का दर्जा पूरी तरह नहीं मिला है।
आरक्षण पर हर रोज़ सवाल खड़े किए जाते हैं।
यानी पेरियार की ज़रूरत आज भी उतनी ही है जितनी 100 साल पहले थी।
पेरियार ने न सिर्फ़ अपनी जिंदगी जी, बल्कि पूरे समाज का नक्शा बदल दिया।
वे कहते थे “किसी भी हालत में खुद को हीन मत मानो। अगर तुम्हें कोई छोटा कहे तो वही सबसे छोटा है।”
आज उनके जन्मदिन पर यह समझना ज़रूरी है कि पेरियार होना सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक सोच है—बराबरी की सोच, सवाल उठाने की ताक़त और अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का साहस।