उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 2024 में हुई सांप्रदायिक हिंसा का मामला फिर सुर्खियों में है। स्थानीय अदालत ने रामगोपाल मिश्रा हत्या मामले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मुख्य आरोपी को फांसी और अन्य नौ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। लेकिन आदेश में मनुस्मृति का हवाला देने से नए विवाद ने जन्म ले लिया है और देशभर में यह विषय कानूनी और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है।
न्यायालय के अनुसार, घटना महाराजगंज कस्बे में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान हुई। 22 वर्षीय रामगोपाल मिश्रा कथित तौर पर मुस्लिम परिवार के घर की छत पर चढ़कर संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहा था और हरे झंडे को हटाकर केसरिया झंडा लहरा रहा था। यह जुलूस मस्जिद के सामने तेज आवाज में इस्लामोफोबिक गानों के साथ निकाला गया था।
फैसले में न्यायाधीश ने अपराध को “अत्यंत जघन्य” बताते हुए कहा कि सामाजिक शांति बनाए रखने के लिए कठोर दंड आवश्यक है। इसी संदर्भ में अदालत ने मनुस्मृति के श्लोक का उद्धरण देते हुए दंड की निवारक भूमिका पर प्रकाश डाला।
सोशल मीडिया पर इस उद्धरण को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई यूज़र्स ने इसे भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के मूल्य और आधुनिक न्यायिक सोच के विपरीत बताया। कुछ आलोचकों ने इसे “मनुवादी सोच का न्यायिक प्रवेश” बताया, जो संवैधानिक सर्वोच्चता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर सवाल खड़े करता है।
वहीं, कुछ कानूनी विशेषज्ञ और टिप्पणीकार मानते हैं कि ऐतिहासिक या दार्शनिक ग्रंथों का हवाला पहले भी न्यायालयों द्वारा संदर्भ के रूप में लिया गया है, और जब तक निर्णय भारतीय दंड संहिता और संविधान पर आधारित है, तब तक इसे समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस मामले में दोषियों की अपील की संभावना जताई जा रही है। बहराइच हिंसा मामला अब केवल हत्या और दंड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्यायपालिका में धर्म और कानून के अलगाव, न्यायिक भाषा और संवैधानिक मूल्य पर गहन विमर्श का हिस्सा बन गया है।
