सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया ने देश के विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ती वैचारिक गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी समारोहों के बहाने सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को वैचारिक विस्तार के मंच में बदलने की कोशिश कर रहा है।
पार्टी की राष्ट्रीय सचिव आतिका साजिद द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आयोजित ‘युवा कुंभ’ जैसे कार्यक्रम महज सांस्कृतिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए एक विशेष राजनीतिक विचारधारा को सामान्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है। SDPI ने इसे “संवैधानिक मूल्यों और शैक्षणिक स्वतंत्रता के लिए खतरा” बताया है।
बयान में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य ज्ञान, आलोचनात्मक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना है, न कि किसी एक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना। पार्टी के अनुसार, आरएसएस की विचारधारा भारत की बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष संरचना के विपरीत रही है, और इसके वैचारिक आधार—विशेषकर एम.एस. गोलवलकर के विचार—अल्पसंख्यकों की भूमिका को लेकर लंबे समय से विवादों में रहे हैं।
SDPI ने कहा कि ऐसे आयोजनों का विरोध कर रहे छात्र “असहिष्णु” नहीं बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी असहमति जता रहे हैं। विशेष रूप से अल्पसंख्यक संस्थानों में इस तरह के कार्यक्रमों से छात्रों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हो सकता है।
पार्टी ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर भी दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। बयान के अनुसार, जहां एक ओर सामान्य छात्र गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, वहीं आरएसएस से जुड़े कार्यक्रमों को अनुमति और पुलिस सुरक्षा दी जाती है, जो संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
SDPI ने मांग की है कि देश के सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र, समावेशी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए, ताकि वे अपने मूल उद्देश्य—शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण—को पूरी निष्पक्षता के साथ निभा सकें।
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