बिहार में मानसिक बीमारियों के बढ़ते मामलों और सड़कों पर बेसहारा घूम रहे मरीजों की स्थिति को लेकर पटना हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और 8 मई 2026 तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार की तैयारियां केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी दिखनी चाहिए।
सरकार का पक्ष: सुविधाओं में सुधार का दावा
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में सुविधाओं को लगातार बेहतर किया जा रहा है। 1 अक्टूबर 2025 से मरीजों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था लागू है, जिसके तहत प्रति मरीज प्रतिदिन 182.32 रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
साथ ही बिहार राज्य मानसिक स्वास्थ्य एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में 144 प्रकार की दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिसके लिए दिसंबर 2025 में अधिसूचना जारी की गई थी।
आंकड़ों में इजाफा, चुनौतियां कायम
अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि मानसिक रोगियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2023-24 में जहां 15,500 नए मरीज दर्ज किए गए थे, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 20,677 तक पहुंच गई।
इसके अलावा ‘टेलीमानस’ हेल्पलाइन भी लोगों के लिए सहारा बन रही है, जिसके माध्यम से 2022 से अब तक 36,000 से अधिक लोगों ने परामर्श लिया है।
पुनर्वास की पहल: घर लौटे सैकड़ों मरीज
रिपोर्ट का सबसे सकारात्मक पहलू मानसिक रोगियों का पुनर्वास रहा है। पिछले 5-6 वर्षों में पुलिस और प्रशासन के सहयोग से 100 से अधिक भटके हुए मरीजों को उनके परिवारों तक पहुंचाया गया है। वर्ष 2026 में भी अब तक 5 मरीजों को सफल इलाज के बाद घर भेजा जा चुका है।
भविष्य की योजना और कोर्ट की सख्ती
वर्तमान में संस्थान में 180 बेड की क्षमता है, जिसमें पुरुष, महिला और कैदी वार्ड शामिल हैं। हालांकि, बढ़ते मरीजों के दबाव को देखते हुए बेड संख्या बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है।
हाईकोर्ट ने आम जनता से भी अपील की है कि सड़कों पर दिखने वाले मानसिक रोगियों की सूचना 24×7 टोल-फ्री नंबर पर दें, ताकि उनका समय पर रेस्क्यू और इलाज सुनिश्चित किया जा सके।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई 2026 को होगी, जहां सरकार को अपनी ठोस कार्ययोजना पेश करनी होगी। मानसिक स्वास्थ्य के इस गंभीर मुद्दे पर अदालत की सख्ती से यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में बिहार में इस दिशा में ठोस सुधार देखने को मिल सकते हैं।
