“20-30 लाख में MBBS सीट का सौदा?”: बिहार से दिल्ली तक फैले कथित मेडिकल एडमिशन रैकेट ने खोली शिक्षा माफिया की परतें, संतोष जायसवाल की गिरफ्तारी पर सियासी संग्राम

देश में NEET परीक्षा, पेपर लीक और मेडिकल एडमिशन को लेकर जारी विवादों के बीच अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बिहार के पूर्वी चंपारण निवासी संतोष कुमार जायसवाल को कथित MBBS एडमिशन रैकेट में गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि यह गिरोह मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने के नाम पर छात्रों और अभिभावकों से लाखों रुपये की वसूली करता था।

इस गिरफ्तारी ने केवल शिक्षा जगत ही नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। बीजेपी और आरजेडी आमने-सामने हैं, जबकि गांव के लोग अब भी संतोष जायसवाल को “मिलनसार और शांत स्वभाव का व्यक्ति” बता रहे हैं।

दिल्ली पुलिस का दावा: “संगठित नेटवर्क की तरह काम करता था गिरोह”

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के अनुसार, 3 मई 2026 को महिपालपुर इलाके में चलाए गए विशेष अभियान के दौरान संतोष कुमार जायसवाल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि गुजरात के सूरत से मिले इनपुट के बाद इस नेटवर्क की निगरानी शुरू हुई थी।

जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह गिरोह NEET और मेडिकल एडमिशन में परेशान छात्रों को निशाना बनाता था। उनसे यह वादा किया जाता था कि “मैनेजमेंट कोटा”, “इंटरनल सेटिंग” या “विशेष संपर्क” के जरिए उन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS सीट दिला दी जाएगी।

पुलिस का आरोप है कि एडमिशन के नाम पर छात्रों से 20 से 30 लाख रुपये तक लिए जाते थे। कई मामलों में अभिभावकों से पहले एडवांस रकम ली गई और बाद में उन्हें कथित तौर पर झूठे आश्वासन दिए जाते रहे।

किन-किन लोगों की हुई गिरफ्तारी?

पुलिस के अनुसार, संतोष जायसवाल की निशानदेही पर तीन अन्य आरोपियों— संत प्रताप सिंह, डॉ. अखलाक आलम उर्फ गोल्डन आलम और विवोद भाई — को भी गिरफ्तार किया गया।

जांच एजेंसियों का दावा है कि ये लोग अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते थे। कोई छात्रों से संपर्क करता था, कोई दस्तावेज जुटाता था, जबकि कुछ लोग होटल और अन्य ठिकानों पर बैठकर कथित डील फाइनल करते थे।

पुलिस ने गाजियाबाद और महिपालपुर के कई होटलों में छापेमारी कर कुछ छात्रों को भी हिरासत में लिया। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वे छात्र पीड़ित थे या नेटवर्क का हिस्सा।

छापेमारी में क्या मिला?

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आरोपियों के पास से कई संदिग्ध दस्तावेज बरामद हुए हैं। इनमें कथित प्रश्नपत्र, उत्तर सामग्री, खाली चेक, छात्रों की मार्कशीट की कॉपियां और एडमिशन से जुड़े कागजात शामिल हैं।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यह नेटवर्क केवल फर्जी एडमिशन तक सीमित था या इसका संबंध किसी बड़े परीक्षा या पेपर लीक सिंडिकेट से भी था।

गांव में हैरानी, “ऐसा कभी नहीं लगा

पूर्वी चंपारण जिले के घोड़ासहन थाना क्षेत्र के लैन बसवरिया गांव में संतोष जायसवाल की गिरफ्तारी को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। नेपाल सीमा के करीब बसे इस गांव में लोग अब भी इस मामले को लेकर हैरान हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि संतोष का व्यवहार सामान्य और सौम्य था। गांव के बुजुर्ग रामसागर प्रसाद यादव ने कहा कि संतोष “अच्छे परिवार का लड़का” है और गांव में उसकी छवि कभी विवादित नहीं रही।

एक अन्य ग्रामीण जोगिंदर प्रसाद यादव ने कहा कि संतोष जब भी गांव आता था, सभी लोगों से सम्मानपूर्वक मिलता था। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि वे उसके बाहरी कारोबार या गतिविधियों के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे।

परिवार ने मीडिया से दूरी बनाए रखी है और गिरफ्तारी पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोलने से इंकार किया है।

राजनीति में घमासान: बीजेपी बनाम RJD

मामले को लेकर बिहार की राजनीति भी तेज हो गई है। बीजेपी प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने आरोप लगाया कि संतोष जायसवाल पहले आरजेडी से जुड़ा रहा है और पार्टी का “भ्रष्ट तत्वों से संबंध” रहा है। उन्होंने कहा कि मेडिकल एडमिशन और NEET जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों को ठगना बेहद गंभीर अपराध है।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि शिक्षा माफिया और राजनीतिक संरक्षण का गठजोड़ बिहार समेत कई राज्यों में लंबे समय से सक्रिय है।

आरजेडी का जवाब: “ध्यान भटकाने की कोशिश”

वहीं चितरंजन गगन ने बीजेपी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संतोष जायसवाल का पार्टी से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने दावा किया कि जिस व्यक्ति का नाम लिया जा रहा है, उसे पहले ही पार्टी से बाहर किया जा चुका था।

आरजेडी ने पलटवार करते हुए कहा कि NEET पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के मामले केवल बिहार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजस्थान, गुजरात और अन्य बीजेपी शासित राज्यों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

पार्टी ने कहा कि यदि कोई दोषी है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए पूरे मामले को मोड़ना उचित नहीं।

मेडिकल शिक्षा में “सीट माफिया” का बढ़ता नेटवर्क

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में मेडिकल सीटों की भारी कमी और निजी कॉलेजों की ऊंची फीस ने एक समानांतर “एडमिशन बाजार” तैयार कर दिया है। हर साल लाखों छात्र NEET परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीमित सीटें होने के कारण हजारों परिवार निजी संस्थानों और बिचौलियों के जाल में फंस जाते हैं।

जांच एजेंसियों के अनुसार, ऐसे नेटवर्क अक्सर “गारंटीड एडमिशन”, “मैनेजमेंट कोटा”, “डायरेक्ट सीट” और “इंटरनल सेटिंग” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर अभिभावकों को भरोसे में लेते हैं।

इस पूरे मामले ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं:

क्या मेडिकल एडमिशन प्रक्रिया में बड़े स्तर पर बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय है?

क्या निजी कॉलेजों और दलालों के बीच कोई सांठगांठ मौजूद है?

क्या NEET परीक्षा और एडमिशन प्रक्रिया में सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है?

क्या शिक्षा क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण ने ऐसे रैकेट को बढ़ावा दिया है?

दिल्ली पुलिस की आगे की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह मामला केवल आर्थिक ठगी का है या फिर देशभर में फैले किसी बड़े शिक्षा माफिया नेटवर्क का हिस्सा।

फिलहाल, बिहार के एक सीमावर्ती गांव से शुरू हुई यह कहानी अब राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर बहस का केंद्र बन चुकी है।

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