अब्दुल रकीब नोमानी

हरियाणा में कॉंग्रेस सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थी। पार्टी के नेताओं का मानना था कि हरियाणा की जनता बीजेपी से ऊब चुकी है और पूरे प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर कॉंग्रेस के पक्ष में जायेगी, इसलिए पार्टी खेमें में सबसे ज्यादा चर्चा इसी पर थी कि कौन होगा हरियाणा का अगला सीएम? वैसे देखें तो हरियाणा कॉंग्रेस दो खेमों में बंटा हुआ है. पहला भूपेंद्र सिंह हुड्डा का खेमा और दूसरा कुमारी शैलजा व रणदीप सुरजेवाला का खेमा। कॉंग्रेस पार्टी में खेमेबाजी ये कोई नई बात भी नहीं है। कॉंग्रेस अपने चुनावी राज्यों में बीजेपी से बाद में अपने खेमे के गुटबाजी से पहले ही चुनाव हार जाती है। यही हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी देखने को भी मिला। हुड्डा और शैलजा का खेमा आपस में आरोप और प्रत्यारोप लगाते रहे। इसके साथ ही दोनों गुट के नेता मीडिया के बीच में आकर मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में ख़ुद को पेश करते रहे। जिनमें पार्टी हित से ज्यादा सभी निजी महात्वाकांक्षा को आगे कर रहे थे। चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप के बीच कुमारी शैलजा अपने घरों से पार्टी के प्रचार के लिए 12 दिन तक बाहर नहीं आई थी। जिसको बीजेपी ने रणनीति का हिस्सा बनाते हुए कुमारी शैलजा के बहाने कॉंग्रेस पार्टी पर दलित अपमान का आरोप लगाकर शैलजा के पार्टी छोड़ने का ख़बर प्लांट करने का काम किया। लेकिन कुमारी शैलजा के तरफ से इनका कोई खंडन नहीं किया जाता है। काँग्रेस के लिए ये वो हिस्सा रहा था. जिनमें पार्टी का बहुत नुक़सान हो चुका होता है। फिर पार्टी आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद कुमारी शैलजा प्रचार के लिए अपने घरों से निकलती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इनके अलावा पार्टी के एक और बड़े नेता महासचिव रणदीप सुरजेवाला तो पूरे चुनाव के दौरान खुद को कैथल से बाहर नहीं निकाल पाए। क्योंकि वहाँ से उनके बेटे आदित्य सुरजेवाला उम्मीदवार थे। जबकि समय-समय पर ये भी खुद को मुख्यमंत्री के दावेदार बता रहे थे। ऐसे में स्थिति को भांपते हुए अंतिम दो दिन राहुल गांधी ने हरियाणा में रोड शो भी किया, लेकिन परिणाम बताते हैं कि वो स्थिति के डैमेज कंट्रोल के लिए काफी नहीं था। जबकि दूसरी ओर हरियाणा में बीजेपी अपने मिशन में लगी रही कि कैसे सत्ता में तीसरी बार वापसी करनी है? वही कॉंग्रेस के भीतर नेता आपस में ही नूरा-कुश्ती खेलने का काम करते रहे। जिसमें पार्टी हित पूरी तरह से निजी महात्वाकांक्षा के सामने छोटी पड़ गई। जबकि दूसरी पार्टियों में आपको ऐसा देखने को नहीं के बराबर मिलेगा। क्योंकि वहाँ पर आलाकमान मामले को समय रहते अच्छे से हैंडल कर पाते हैं। जिनसे पब्लिक डोमेन में खेमेबाजी की ख़बरें नहीं आ पाती है।
हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए न सिर्फ चौंकाने वाला था. बल्कि उसको निराश करने वाला भी था। क्योंकि कॉंग्रेस ये मानकर चल रही थी कि वो इसबार हरियाणा में सरकार बनाने जा रही है। हर एक्जिट पोल में भी कॉंग्रेस की सरकार बनती दिख रही थी। लेकिन जब परिणाम सामने आया तो हरियाणा के 90 विधानसभा सीट में बीजेपी 48 सीट जीतकर तीसरी बार सरकार बनाने में क़ामयाब रही। हरियाणा में ये पहला मौका था. जब कोई पार्टी तीसरी बार सत्ता में वापसी के रास्ते के को आसान कर पाई थी। हरियाणा के जीत से जहां बीजेपी को चुनावी रणनीति के लिए सराहना मिल रही थी, तो दूसरी ओर कॉंग्रेस को गठबंधन के साथियों से चुनावी रणनीति में विफलता को लेकर विरोध में स्वर सुनने को मिलने शुरू हो जाते हैं। क्योंकि गठबंधन के साथियों का कहना था कि कॉंग्रेस बीजेपी से आमने-सामने की लड़ाई में लगातार विफ़ल हो रही है। जीती हुई भी लड़ाई को ये आसानी से हार जा रहे हैं।
कॉंग्रेस को हरियाणा हार की कीमत अब महाराष्ट्र और यूपी में चुकानी पड़ रही है।
इन्डिया गठबंधन में कॉंग्रेस के सहयोगी पार्टियों के तरफ से कहा जाने लगा को कॉंग्रेस सिर्फ ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ना जानती है। लेकिन परिणाम को अपने पाले में नहीं कर पाती है। जबकि ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने से ये जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा सीटों को जीता जाए। कॉंग्रेस अक्सर अपने राज्यों में इन्डिया गठबंधन के साथी पार्टियों को साथ लेकर नहीं चलती है। वो वहाँ दूसरे पार्टियों को पूरी तरह से नज़रंदाज कर देती है। जिनसे बीजेपी का काम पूरी तरह से आसान हो जाता है। हरियाणा के हार के बाद से ही महाराष्ट्र में कॉंग्रेस के सहयोगी दल उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की एनसीपी (शरद पवार) कॉंग्रेस पार्टी से बार्गेनिंग शुरू कर देती है। जिसमें दोनों पार्टियां क़ामयाब भी रही। जब महाराष्ट्र में सीटों का ऐलान हुआ तो तीनों पार्टियों ने 85-85 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। शेष बचे सीटों को छोटी-छोटी पार्टियों को देने की बात कही गई। ये आंकड़ें सबों के लिए चौकाने वाला ही था। क्योंकि सब मानकर चल रहे थे कि कॉंग्रेस इसबार विधानसभा चुनाव में 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। क्योंकि कॉंग्रेस ही महाराष्ट्र की ऐसी पार्टी है बची है, जिसको बीजेपी तोड़ नहीं पाई है। जबकि दूसरी और देखेंगे तो एनसीपी और शिवसेना दोनों पार्टियों को बीजेपी ने ना सिर्फ तोड़ा बल्कि दोनों पार्टियों के आधे से ज्यादा विधायक और कैडर भी पार्टियों से चले गए। लेकिन हरियाणा की एक हार ने कॉंग्रेस को उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया। जबकि कॉंग्रेस के मुक़ाबले दोनों पार्टियों के पास नेता और कैडर आपको कमज़ोर दिखेंगे। क्योंकि दोनों पार्टी को बीजेपी ने स्प्लिट कर दो हिस्सों में बांट दिया। लेकिन फिर भी कॉंग्रेस को दोनों पार्टियों के साथ बराबर सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ रहा है। जबकि इनके अलावा भी आप देखेंगे तो महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का परिणाम भी पूरी तरह से कॉंग्रेस के पक्ष में गया था। महाराष्ट्र में कॉंग्रेस सांसदों के मामलें में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी है। जिनमें इन्होंने 16 सीटों पर चुनाव लड़ने के साथ 13 सीटों पर चुनाव जीतने में क़ामयाब रहे थे। इनमें भी 11 लोकसभा की सीट ऐसी है, जहां कॉंग्रेस ने बीजेपी के उम्मीदवार को आमने-सामने की लड़ाई में हराया है। ऐसे में कॉंग्रेस मानकर चल रही थी कि महाराष्ट्र के चुनाव में वो गठबंधन के सहयोगी दलों में बड़े भाई के भूमिका में रहेंगे। लेकिन हरियाणा की हार ने कॉंग्रेस के इस राह को पूरी तरह से चौपट कर दिया।
कमोबेश यही हाल कॉंग्रेस का यूपी में भी रहा। यूपी के 9 विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने जा रहा है। जिसमें कॉंग्रेस पार्टी मानकर चल रही थी कि समाजवादी पार्टी के तरफ से गठबंधन में उनको तीन से चार सीट मिल जायेगी। लेकिन समाजवादी ने बारी-बारी से 8 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार का ऐलान कर दिया। खबर आई कि एक गाजियाबाद तरफ की एक सीट कॉंग्रेस पार्टी को ऑफर की जा रही है। जिसपर कॉंग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवार देने से मना कर दिया। क्योंकि कॉंग्रेस को ये सीट कमज़ोर नज़र आ रही थी। ऐसे में कॉंग्रेस ने उपचुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं देने का फैसला किया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ट्विट कर ऐलान किया कि यूपी विधानसभा उपचुनाव समाजवादी इन्डिया गठबंधन में लड़ रही है। लेकिन सभी जगह साईकिल छाप ही निशान होंगें। फिर यूपी कॉंग्रेस के नेताओं के तरफ से ऐलान किया जाता है कि पार्टी आलाकमान ने यूपी विधानसभा उपचुनाव में उम्मीदवार नहीं देने का फैसला किया है। कॉंग्रेस पार्टी का समर्थन समाजवादी पार्टी को रहेगा। इस कहानी की गाथा असल में हरियाणा की हार ने लिखी थी। जिसकी क़ीमत कॉंग्रेस को महाराष्ट्र और यूपी में चुकानी पड़ रही है। दूसरी बात कॉंग्रेस पार्टी का इन्डिया गठबंधन में रहना भी जरूरी है। यही वज़ह रही कि कॉंग्रेस को हरियाणा हार के वज़ह से दोनों जगह समझौता करना पड़ा। दोनों राज्यों में इन्डिया गठबंधन के साथी पार्टियों ने अपने हिसाब से कॉंग्रेस को ना सिर्फ दबाया बल्कि उनसे अपनी शर्तें भी मनवा पा रहे हैं। ऐसे में अगर हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनती तो स्थिति कुछ और ही होता।