उत्तरप्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 जनवरी 2026 को एक अहम निर्णय सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की जाति जन्म से तय होती है और यह धर्म परिवर्तन या अंतरजातीय विवाह से प्रभावित नहीं होती। अदालत ने यह टिप्पणी एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े विवाद में आरोपी पक्ष की आपराधिक अपील खारिज करते हुए की।
फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि जाति‑आधारित कानूनों की सुरक्षा व्यक्तिगत जीवन निर्णयों से सीमित नहीं है, और महिलाओं को अंतर्जातीय विवाह के बाद भी कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
अलीगढ़ जिले में एक महिला (मूल रूप से पश्चिम बंगाल निवासी) ने आरोपियों के खिलाफ मारपीट, गालियां और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने की शिकायत दर्ज कराई थी। इस घटना में महिला समेत तीन लोग घायल हुए थे। निचली अदालत ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट के तहत समन जारी किया। इसके खिलाफ दिनेश और आठ अन्य आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की! आरोपियों ने तर्क दिया कि महिला ने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया है। इसलिए उनका कहना था कि महिला अब अपनी मूल जाति में नहीं आती और इस आधार पर एससी/एसटी एक्ट लागू नहीं होता।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार की पीठ ने आरोपियों की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जाति जन्म से निर्धारित होती है और विवाह या धर्म परिवर्तन से नहीं बदलती। कोर्ट ने यह भी कहा कि क्रॉस‑केस (जहाँ दोनों पक्षों की शिकायतें दर्ज हों) किसी शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। निचली अदालत ने शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान तथा चोट के प्रमाण के आधार पर ही समन जारी किया था।
फैसले से महिलाओं को अंतर्जातीय विवाह के बाद भी अपने मूल समुदाय में कानूनी सुरक्षा मिलेगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जाति‑आधारित कानून व्यक्तिगत जीवन निर्णयों से सीमित नहीं हैं, बल्कि वास्तविक सामाजिक पहचान पर आधारित हैं। यह फैसला जाति‑आधारित भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ कानूनी सुरक्षा को मजबूत करता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट, न्यायोचित और समाज‑हितैषी है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि जातिगत पहचान जीवनभर स्थिर रहती है और विवाह या धर्म परिवर्तन जैसी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती।