अटल जी कितने ‘सेक्युलर’?

मुहम्मद फ़ैज़ान: छात्र पत्रकारिता सह जनसंचार विभाग मानू हैदराबाद

आज अटल जी की पुण्य तिथि है. उनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि संघ के साथ जुड़ाव और भाजपा में रहने के बावजूद भी उनका हिन्दूत्व सॉफ़्ट था. लेकिन क्या उनका हिन्दूत्व सॉफ़्ट् था या वक्त की ज़रूरत के हिसाब से उग्र हिन्दूत्व के सामने एक नरम हिन्दूत्व का प्रयोग? पत्रकार से राजनेता बने अटल जी अपने भाषण से लोगों को अाकर्षित कर लिया करते थे. वो एक अलग शैली के वक्ता थे, उनके पास शब्दों का भंडार था, जिस कारण वो आसानी से कुछ भी कहकर निकल जाते थे. खूलकर न बोलने के बावजूद भाजपा और संघ के हर एजेण्डे को इशारे में या मूक समर्थन ज़रूर होता था, जैसे बाबरी विध्वंस के समय उनका ये कथन कि ‘ज़मीन को समतल कर दो’ सीधे-सीधे लोगों को ऊकसाने वाला था. इसी प्रकार बाबरी विध्वंस में भाजपा के शिर्ष नेताअों के खुल्लम खुल्ला संलिप्पतता के बावजूद उनके प्रति नरम रवैया बताता है कि वो कितने सॉफ़्ट थे.वो भले ही आडवाणी की रथ यात्रा में शामिल नहीं थे लेकिन ऊंहे अटल जी का पूरा समर्थन हासिल था. इसी प्रकार 2002 के गुजरात दंगों में तत्कालिन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बस इतना कह कर क्लीन चिट दे देना कि ‘शासक को राजधर्म का पालन करना चाहिए’ जबकि प्रधानमंत्री होने की वजह से उनका राजधर्म था कि वो तत्कालिन सरकार को बर्खास्त करते. उन्होने उस समय खुद राजधर्म का पालन नहीं किया था, ये घटना बताती है कि वो कितने ‘सॉफ़्ट ‘ थे? 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बनने से पहले एचडी देवगौड़ा सरकार ने जातिवार जनगणना कराने को मंजूरी दे दी थी जिसके चलते 2001 में जातिगत जनगणना होनी थी. लेकिन वाजपेयी सरकार ने इस फ़ैसले को पलट दिया. जिसके चलते जातिवार जनगणना नहीं हो पाई. उन्ही के कार्यकाल में पेंशन खत्म हुआ.वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान देश में निजीकरण को उस रफ़्तार तक बढ़ाया गया जहां से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं बची. वाजपेयी की इस रणनीति के पीछे कॉर्पोरेट समूहों की बीजेपी से सांठगांठ रही. वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक अनोखा मंत्रालय का गठन किया था. इसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे. शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी जी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान ज़िंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी. वाजपेयी की विदेशनीति और कूटनीति की प्रशंसा ज़रूर होनी चाहिए. विशेषकर जब उन्होने अंतर्रराष्ट्रीय प्रतिबंधो को अपनी कूटनीति के ज़रीए खत्म किया. वे दलिय कटूता से उपर उठकर अपने विरोधियों को भी स्थान देना जानते थे. किसी भी व्यक्ति के जीवन के हर पहलू पर विश्लेशण होना चाहिए. अटल जी को मैं नरम या उग्र में नहीं बांटता वो बीजेपी के लिए उस वक्त की ज़रूरत थे. हम किसी को नरम या उग्र कहकर उस काल में हुए अपराध के लिए उसे को बरी नहीं कर सकते.(ये आर्टिकल मुहम्मद फ़ैज़ान ने कलाम रीसर्च फाउंडेशन के लिए लिखा है)

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