एटा,उत्तरप्रदेश में दलित बारात पर पथराव, पुलिस की सुरक्षा में हुई शादी

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

उत्तरप्रदेश के एटा ज़िले के अवागढ़ थाना क्षेत्र के ढकपुरा गाँव में जातीय तनाव की चपेट में एक दलित युवक की बारात आ गई। ठाकुर बहुल क्षेत्र से गुजर रही इस बारात को कथित रूप से दबंगों ने रोकने की कोशिश की और उस पर पथराव कर दिया। इस हमले में एक पुलिस कॉन्स्टेबल समेत तीन बाराती घायल हो गए।

घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस प्रशासन हरकत में आया और भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचा। स्थिति को नियंत्रित करने के बाद प्रशासन ने बारात को पुलिस सुरक्षा में विवाह स्थल तक पहुंचाया, जहां शादी की रस्में शांतिपूर्वक संपन्न कराई गईं।

बारात एक दलित युवक की थी, जो गांव के एक रास्ते से गुजर रही थी। उसी क्षेत्र में ठाकुर समुदाय का वर्चस्व है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ ठाकुर समुदाय के युवकों ने बारात का रास्ता रोकने की कोशिश की। जब बारात आगे बढ़ी, तो उस पर ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया गया।

इस हमले में पुलिसकर्मी सुनील कुमार के सिर में चोट आई, जबकि तीन अन्य बाराती घायल हो गए। घायलों को प्राथमिक इलाज के लिए नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।

मामले की जानकारी मिलते ही एसएसपी श्याम नारायण सिंह के निर्देशन में अतिरिक्त पुलिस बल मौके पर भेजा गया। पुलिस ने मोर्चा संभालते हुए माहौल को काबू में किया और बारात को विवाह स्थल तक सुरक्षित पहुँचाया।

पुलिस ने 16 नामजद और 40 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ IPC की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। गांव में अतिरिक्त फोर्स की तैनाती कर दी गई है और दोषियों की पहचान की जा रही है।

यह कोई पहली घटना नहीं है जब दलित समुदाय की बारात को निशाना बनाया गया हो। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, जिनमें जातिगत भेदभाव के चलते दलित बारातों को रोकने, अपमानित करने या हिंसा करने की कोशिश की जाती है।

दलितों को संविधान द्वारा प्रदत्त समान अधिकारों की असलियत जमीनी हकीकत में बार-बार कटघरे में खड़ी होती है। यह घटना साफ़ दिखाती है कि ग्रामीण इलाकों में अब भी जातिवादी मानसिकता कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है।

ढकपुरा की यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि समाज को केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक बदलाव से सुधारा जा सकता है। जब तक जाति के नाम पर उत्पीड़न करने वाले लोगों को त्वरित और कठोर सजा नहीं दी जाती, तब तक संविधान के समानता के सिद्धांत केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे।

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