दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 के उत्तर‑पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम समेत 9 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए गवाहों के बयान अस्पष्ट और भरोसेमंद नहीं थे, जिन पर दोष तय करना सुरक्षित नहीं है।
कोर्ट ने क्या कहा?
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने अपने आदेश में कहा कि गवाहों के बयान में कई विरोधाभास और अस्पष्टताएँ थीं। तारीख और घटना स्थल के बारे में गवाहों ने अलग-अलग बयान दिए, जिससे अभियोजन का मामला कमजोर हो गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन ने दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं पेश किए।
अभियोजन के कमजोर सबूत
कोर्ट ने कहा कि मामले में कोई विश्वसनीय फ़िंगरप्रिंट, वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग या फोन ट्रैकिंग उपलब्ध नहीं थी। केवल गवाहों के अस्पष्ट और सामान्य बयानों के आधार पर आरोप तय करना न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं माना गया।
मामले का पृष्ठभूमि
यह मामला 24‑25 फरवरी 2020 को उत्तर‑पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ा था। आरोप था कि आरोपी चंद बाग इलाके में:
वाहन और दुकानों को नुकसान पहुंचाते थे
आगजनी करते थे
व्यापारियों और स्थानीय लोगों की संपत्ति को क्षति पहुंचाते थे
कोर्ट का निष्कर्ष
कोर्ट ने कहा कि बरी होने का अर्थ यह नहीं कि आरोपियों ने घटना में भाग नहीं लिया, बल्कि यह है कि अभियोजन ने दोष “सभी संदेह से परे” साबित नहीं किया। भारतीय कानून में किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक उसके खिलाफ ठोस और अपरिवर्तनीय सबूत मौजूद न हों।
शाह आलम समेत 9 आरोपियों की बरी की मुख्य वजह गवाहों की असमर्थनीय गवाही और अभियोजन के कमजोर सबूत रहे। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर किसी पर दोष तय करना सुरक्षित नहीं है।