EFLU में राजनीतिक कैदियों पर चर्चा रोकी गई, छात्रों का आरोप – “लोकतांत्रिक जगहें सिमट रही हैं”

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

अंग्रेज़ी और विदेशी भाषाएँ विश्वविद्यालय (EFLU) में प्रस्तावित एक छात्र कार्यक्रम को प्रशासन ने रोक दिया। छात्रों का कहना है कि प्रशासन ने इसे “एंटी-सरकारी” बताते हुए आयोजन पर पाबंदी लगाई और पोस्टर में दिखाए गए कार्यकर्ताओं को “दंगाई” तक कहा।

कार्यक्रम जतिन दास शहादत दिवस और राजनीतिक कैदी दिवस पर होना था, जिसे Progressive Reading Circle और Fraternity Movement ने मिलकर आयोजित करने की योजना बनाई थी। पोस्टर में यूएपीए (UAPA) के तहत जेल में बंद कई नाम शामिल थे—जैसे शाहीन बाग आंदोलन से जुड़े शरीज़ील इमाम, गुलफिशा फातिमा, जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद, कार्यकर्ता खालिद सैफ़ी, भीमा कोरेगांव आरोपियों में से ज्योति जगताप, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सुनीता पोटम और पत्रकार रिज़ाज़ एम. सिद्दीकी।

छात्रों का आरोप है कि पोस्टर जारी होते ही उन्हें प्रो-क्टर कार्यालय में तलब किया गया। वहाँ उन्हें बताया गया कि कार्यक्रम “एंटी-सरकारी” है और इसे आयोजित नहीं किया जा सकता। सोमवार को एक बार फिर प्रो-क्टरियल बोर्ड, डीन ऑफ स्टूडेंट्स और उप-डीन ने छात्रों को बुलाकर यही निर्णय सुनाया। आयोजकों का कहना है कि प्रशासन ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी और कैंपस में निगरानी बढ़ा दी ताकि कार्यक्रम न हो सके।

संयुक्त बयान जारी कर PRC, Fraternity Movement, MSF और NSUI ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की। उनका कहना है कि यह विश्वविद्यालय प्रशासन की “अलोकतांत्रिक मानसिकता” को उजागर करता है और छात्रों की बोलने की आज़ादी पर हमला है। उन्होंने कहा “जब हम जातिन दास जैसे क्रांतिकारियों को याद करते हैं, तो आज के कैद कार्यकर्ताओं की चर्चा भी ज़रूरी है, जो अन्याय के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं।”

छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ABVP जैसे संगठनों को बिना किसी रोक-टोक अनुमति देता है, जबकि बाकी समूहों को रोक दिया जाता है। इसके उलट, पिछले साल फिलिस्तीन समर्थन सप्ताह के दौरान आयोजित “Sumud” नामक कार्यक्रम को भी प्रशासन ने रोक दिया था।

कई छात्रों का मानना है कि यह घटनाएँ बताती हैं कि कैंपस धीरे-धीरे “सैफ्रोनाइजेशन” की ओर धकेले जा रहे हैं और लोकतांत्रिक असहमति को दबाया जा रहा है। एक छात्र ने कहा “यह सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक जगहों को खत्म करने की कोशिश है। हमें इसे लेकर संघर्ष तेज करना होगा।”

Jatindra Nath Das (जतिन दास) 1929 में लाहौर सेंट्रल जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हुए थे। तभी से उनका बलिदान राजनीतिक कैदियों के संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। इसी संदर्भ में EFLU के छात्र इस कार्यक्रम के जरिए वर्तमान समय के राजनीतिक कैदियों की स्थिति पर चर्चा करना चाहते थे।

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