असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बुधवार को बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर एक बार फिर विवादित बयान दिया। शिवसागर ज़िले में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने महात्मा गांधी का हवाला देते हुए ऐसी नीतियों की वकालत की, जिनका उद्देश्य कथित तौर पर “ऐसा माहौल बनाना” है कि वे असम में रह न सकें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार रोज़ाना 20–30 लोगों को असम से बाहर निकाल रही है, लेकिन “सबको लाइन में खड़ा कर ट्रेन से बांग्लादेश भेजना संभव नहीं है।” उन्होंने कहा कि इसके बजाय ऐसी परिस्थितियाँ बनाई जानी चाहिए, जिनमें लोग ख़ुद ही राज्य छोड़ने को मजबूर हों।
सरमा ने दावा किया कि राज्य में अब तक क़रीब 1.5 लाख बीघा ज़मीन से अतिक्रमण हटाया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जिनके पास ज़मीन नहीं होगी, उनके लिए असम में रहना संभव नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा, “न ज़मीन दो, न गाड़ी दो, न रिक्शा, न ठेला। फिर वे अपने आप चले जाएँगे।”
मुख्यमंत्री ने इस नीति को महात्मा गांधी के “असहयोग” और “सविनय अवज्ञा आंदोलन” से प्रेरित बताया और असम के लोगों से इसे अपनाने की अपील की।
अपने बयान में सरमा ने “मिया” और “मुसलमान” के बीच अंतर करने की बात भी कही। उन्होंने कहा, “मिया के नाम पर मुसलमानों को परेशान मत करो और मुसलमानों के नाम पर मियाओं को संरक्षण मत दो।”
गौरतलब है कि “मिया” शब्द को असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए अपमानजनक माना जाता है।
ये बयान ऐसे समय सामने आए हैं जब राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हो रही हैं। इसी दिन असम कांग्रेस ने “Who is HBS?” नाम से एक अभियान शुरू करते हुए मुख्यमंत्री और उनके परिजनों पर 12,000 बीघा ज़मीन पर अवैध कब्ज़े का आरोप लगाया।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई, पूर्व छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और एआईसीसी के असम प्रभारी जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि पार्टी की आंतरिक जांच में ज़मीन से जुड़े नियमों के उल्लंघन सामने आए हैं। कांग्रेस ने इस संबंध में जनता से जानकारी जुटाने के लिए एक वेबसाइट भी लॉन्च की है।
आरोपों के कुछ ही घंटों बाद मुख्यमंत्री सरमा ने गोगोई, बघेल, जितेंद्र सिंह और देबब्रत सैकिया के ख़िलाफ़ सिविल और आपराधिक मानहानि के मुक़दमे दर्ज कराने की घोषणा की।
हाल के दिनों में मुख्यमंत्री के बयान लगातार विवादों में रहे हैं। इससे पहले डिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान उनका उद्देश्य “मिया लोगों को तकलीफ़ पहुँचाना” है। उन्होंने आम लोगों से उन्हें “परेशान करने” की अपील भी की थी।
इन बयानों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है, जबकि जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए इन टिप्पणियों को सांप्रदायिक और असंवैधानिक बताया है।
असम में मुसलमान, विशेषकर बंगाली मूल के मुसलमान, सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समुदायों में शामिल हैं और उन्हें अक्सर “बाहरी” या “अवैध प्रवासी” के रूप में देखा जाता है। मुख्यमंत्री के ताज़ा बयान ने राज्य की राजनीति में एक बार फिर अल्पसंख्यक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को लेकर बहस तेज़ कर दी है।