उतराखंड में लागू किया गया समान नागरिक संहिता धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने की कोशिश: एसडीपीआई

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुहम्मद शफी ने अपने जारी किए गए एक बयान में कहा कि उत्तराखंड में बीजेपी सरकार द्वारा लागू किया गया समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code), सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को खत्म करने की कोशिश है और यह अल्पसंख्यक समुदायों के अपने धार्मिक प्रथाओं का पालन करने के अधिकार का उल्लंघन करता है।

मुहम्मद शफी ने कहा कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के हिंदुत्व विचारधारा की शुरुआत के रूप में पेश किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता का मतलब है कि विभिन्न समुदायों के अपने अलग-अलग रीति-रिवाज हैं और एक समान कोड इन भिन्नताओं को नजरअंदाज करेगा, जिससे सामाजिक अशांति उत्पन्न हो सकती है।

उन्होंने आगे कहा, “असल में, 2018 में, कानूनी आयोग ने समान नागरिक संहिता को अनावश्यक बताते हुए, भेदभाव और असमानता को खत्म करने के लिए मौजूदा पारिवारिक कानूनों में संशोधन की सिफारिश की थी।”

मुहम्मद शफी ने कहा, “समान नागरिक संहिता उत्तर भारत के हिंदू समुदायों के मुकाबले अन्य हिंदू समुदायों के अधिकारों की अनदेखी कर रहा है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 उत्तर भारत की प्रथाओं पर आधारित हैं, जिन्हें पूर्वी और दक्षिणी राज्यों पर प्राथमिकता दी गई है।”

उन्होंने बीजेपी सरकार को चुनौती दी और कहा कि अगर वह समाज के सभी पहलुओं में समानता चाहती है तो आयकर कानूनों में भी संशोधन करना होगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उत्तराखंड में लागू किया गया समान नागरिक संहिता, आयकर अधिनियम में वर्णित हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के प्रावधानों के साथ कैसे तालमेल बैठेगा।

अंत में, शफी ने यह बताया कि वर्तमान में केंद्रीय कानून भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और करों को नियंत्रित करते हैं, जिसका मतलब है कि यह पूरे देश में लागू होते हैं, न कि सिर्फ किसी विशेष राज्य में।

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