“अब आपका करियर बर्बाद हो सकता है”: कोर्ट ने TISS के छात्रों को साई बाबा बरसी कार्यक्रम मामले में कड़ी चेतावनी दी

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (TISS) के नौ छात्रों को मुंबई की एक सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने सोमवार को चेतावनी दी कि जी.एन. साईबाबा की पुण्यतिथि सभा में शामिल होने के मामले में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर उनके करियर पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनोज बी. ओज़ा ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा “अब आपका आपराधिक रिकॉर्ड बन गया है। यह सिर्फ यहीं नहीं, बल्कि पूरे देश में आपके रिकॉर्ड के रूप में दर्ज होगा। आपने इस उम्र में बड़ा फैसला लिया है और इससे आपके भविष्य पर असर पड़ेगा। आपका करियर बर्बाद हो सकता है।”

न्यायाधीश ने यह भी सवाल उठाया कि कितने छात्र महाराष्ट्र के बाहर से हैं और उनके परिवार इस मामले से अवगत हैं या नहीं। न्यायालय ने चेतावनी दी कि सरकारी नौकरियों की संभावनाएं लगभग खत्म हो सकती हैं और निजी क्षेत्र में भी इससे रोजगार प्रभावित हो सकता है।

यह विवाद 12 अक्टूबर 2025 को TISS के डियोनार (Deonar, मुंबई) कैंपस में आयोजित कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसमें छात्रों ने पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता जी.एन. साईबाबा की पहली पुण्यतिथि मनाई थी।

ट्रोम्बे पुलिस (Trombay Police) द्वारा दर्ज FIR में आरोप हैं कि यह सभा अनधिकृत थी। छात्रों पर “अवैध सभा आयोजित करना”, “समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना” और “देश की अखंडता के खिलाफ कार्य” जैसी धाराएँ लगाई गई हैं। इसके साथ ही पुलिस ने छात्रों के मोबाइल फोन और लैपटॉप जब्त कर लिए हैं।

जी.एन. साईबाबा पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। उन्हें 2014 में महाराष्ट्र पुलिस ने UAPA के तहत गिरफ्तार किया था, और मार्च 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने UAPA के तहत आरोप लगाने की मंजूरी को असंबद्ध (invalid) घोषित कर उन्हें रिहा किया। साईबाबा की स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण 12 अक्टूबर 2024 को मृत्यु हो गई थी।

इस घटना के बाद से TISS के छात्र समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। छात्रों का कहना है कि पुलिस ने अत्यधिक कदम उठाए और उन्हें निशाना बनाया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने फिलहाल मामले में टिप्पणी नहीं की है।

अदालत ने छात्रों को अंतरिम सुरक्षा (interim protection from arrest) प्रदान की है। अगली सुनवाई इस महीने के अंत में होगी, जब anticipatory bail (आत्मरक्षार्थ जमानत) पर बहस की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न केवल छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाता है, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर प्रशासनिक नियंत्रण के स्वरूप को भी सामने लाता है।

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